पर्यावरण विशेष
विवेक दुबे
जबलपुर: सड़ांध मारता हुआ पानी, चारों तरफ फैला गोबर और नदी में पसरी गंदगी… जी हां ये नजारा नर्मदा नदी की सहायक नदी माने जाने वाली गौर नदी का है जहां पानी के दूषित होने की वजह से क्षेत्र में जलसंकट व्याप्त हो गया है। नतीजा गौर नदी जहर का घूंट पीने मजबूर हो चुकी है जिसे ठीक करने वाला फिलहाल प्रशासन का कोई भी जिम्मेदार नजर नहीं आ रहा है।
आलम ये है कि गौर सालीवाड़ा गांव के नलकूपों का पानी भी करीब 100 फीट नीचे चला गया है और जब ग्रामीण नलकूपों के पास पहुंचते हैं तो उसके संचालन में पानी की जगह सिर्फ हवा की सप्लाई होती है। वहीं दूसरी तरफ सालीवाड़ा सरपंच का कहना है कि वे मजबूर हैं नलकूप से पानी की सप्लाई करने में, क्योंकि गौर नदी में डेयरियों का गंदा पानी समा रहा है जिस कारण वो पानी न तो पीने येाग्य है और न ही उपयोग करने योग्य। बीते 50 सालों में सालीवाड़ा, गौर में कभी जलसंकट की समस्या नहीं आई लेकिन अब क्षेत्र में गौर नदी होने के बावजूद ग्रामीणों को पानी के लिए जूझना पड़ रहा है।
नियमों को तोड़कर संचालित हो रहीं डेयरियां
गौर सालीवाड़ा सरपंच ने नवभारत को बताया कि गौर नदी के पास नियमों को तोड़ते हुए संचालित की जा रहीं डेयरियों से गोबर, मूत्र बहाया जा रहा है जो सीधे नदी में मिल रहा है जिससे गौर नदी का पानी दूषित हो रहा है। इस गंदगी के कारण पानी का जलस्तर भी नीचे चला गया है। लिहाजा ग्रामीणों ने अब कलेक्टर के पास शिकायत करने का मन बना लिया है। सरपंच के मुताबिक जिला कलेक्टर दीपक सक्सेना से मांग की जाएगी कि गौर नदी के पास संचालित हो रहीं डेयरियों को वहां से हटाया जाए और गौर नदी को स्वच्छ किया जाए जिससे क्षेत्र में जलसंकट की समस्या दूर हो जाए।
इनका कहना है…
—नर्मदा नदी की सहायक नदी कही जाने वाली गौर नदी के हाल इन दिनों बेहद खराब हैं। अगर गौर नदी के पास स्थित डेयरियों को समय रहते प्रशासन द्वारा नहीं हटाया गया तो गौर सालीवाड़ा के साथ यहां के आसपास के 50 गांवों में पानी की त्राहि-त्राहि हो जाएगी।
–सौरभ राय, सरपंच सालीवाड़ा।
भू-माफिया के अवैध कब्जे नर्मदा नदियों को डाल रहे संकट में…
गौर नदी ,हिरन और परियट नदी में लंबे समय यानि 6 से 8 माह तक पानी की रूकावट नहीं हो रही है। करीब 80 से 100 फीट चौड़ी इन नदियों के पाट भी इन दिनों सिमटते जा रहे हैं। वजह कैचमेंट एरिया में खेती होना.. जी हां नर्मदा नदियों का कैचमेंट एरिया भू-माफिया अपने कब्जे में लगातार लेते जा रहा है। जानकारी के अनुसार नर्मदा नदियों से 300 मीटर के दायरे में कोई भी निर्माण कार्य प्रतिबंधित है लेकिन बावजूद इसके अवैध निर्माण हो रहे हैं। जलस्रोत की धार कैचमेंट एरिया से बहकर आने वाले पानी से चौड़ी होती है।
पर्यावरण विद डॉ. मनोज जायसवाल, शिल्पी गोंटिया का कहना है कि नर्मदा नदी की सहायक नदियों की यह दुर्दशा एक बड़े जलसंकट की आहट दे रही है। इसलिए नदियों की सिमट रही धार पर शोध होना चाहिए। इसके लिए जबलपुर में में रिवर रिसर्च सेंटर को स्थापित किया जाना चाहिए जहां पर नदियों की परिस्थितियों के तंत्र का वैज्ञानिक तरीके से अध्ययन संभव है। जिससे नर्मदा नदियों की स्थिति बेहतर हो सकेगी।
इनका कहना है
–समय रहते नर्मदा की सहायक नदियों को पुनर्जीवन देने की पहल जबलपुर में होनी चाहिए जिससे सारी तस्वीर बदल जाएगी। इसके लिए जबलपुर में रिवर रिसर्च सेंटर स्थापित होना चाहिए।
–डॉ. पीआर देव, वैज्ञानिक
