
मुंबई , 04 जून,(वार्ता) भारत में वित्त वर्ष 2024 -25 में स्टेनलेस स्टील की खपत 48.5 लाख टन रहने का अनुमान है, जो वित्त वर्ष 2023-24 की तुलना में लगभग 8 प्रतिशत अधिक है।
इंडियन स्टेनलेस स्टील डेवलपमेंट एसोसिएशन(आईएसएसडीए)ने आज यहां आयोजित ग्लोबल स्टेनलेस स्टील एक्सपो के दौरान भारत में वित्त वर्ष 2025 में स्टेनलेस स्टील की खपत के आंकड़े जारी करते हुये भारतीय बाजार की विकास संभावनाओं पर भरोसा जताया। व्यापक आर्थिक और राजनीतिक चुनौतियों के बावजूद, भारत में स्टेनलेस स्टील का बाजार मजबूत बना हुआ है और वैश्विक स्तर पर सबसे तेजी से बढ़ते बाजारों में से एक है।
इस मौके पर संगठन के अध्यक्ष राजामणि कृष्णमूर्ति ने कहा, “जैसे-जैसे दुनिया स्थिरता और मजबूत बुनियादी ढांचे की ओर बढ़ रही है, स्टेनलेस स्टील की प्रासंगिकता बढ़ती जा रही है। हालाँकि, अनुचित मूल्य वाले आयातों की बाढ़ घरेलू निर्माताओं के लिए चुनौती बनी हुई है। संगठन ने बार-बार इन खतरों के प्रति सावधानी बरतने की चेतावनी दी है, खासकर चीन और वियतनाम जैसे देशों से अनियंत्रित ट्रेड डायवर्जन से घरेलू उत्पादन और इस क्षेत्र में रोजगार पर नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है।”
उन्होंने कहा कि भारतीय स्टेनलेस स्टील उद्योग के हितों की सुरक्षा के लिए सरकार और उद्योग के हितधारकों को सतर्क रहना होगा, आयात के रुझानों पर बारीकी से नजर रखनी होगी और आवश्यक सुरक्षात्मक उपायों को सक्रिय रूप से लागू करना होगा। आईएसएसडीए सरकार और उद्योग भागीदारों के साथ मिलकर इन चुनौतियों का सामना करने और भारत के स्टेनलेस स्टील उद्योग की दीर्घकालिक वृद्धि को सुनिश्चित करने के लिए प्रतिबद्ध है। श्री कृष्णमूर्ति ने समान प्रतिस्पर्धा के लिए अपनी मांग दोहराते हुये नीति निर्माताओं से आग्रह किया कि वे इस क्षेत्र की सुरक्षा करें, साथ ही नवाचार और वैश्विक प्रतिस्पर्धा को बढ़ावा दें।
भारत की स्टेनलेस स्टील उत्पादन क्षमता 75 लाख टन है, जिसमें फिलहाल लगभग 60 प्रतिशत क्षमता का उपयोग हो रहा है। इसका मतलब है कि अगर सही नीतियां बनी रहें और मांग बनी रहे, तो उत्पादन बढ़ाने की अच्छी संभावनाएं हैं।
जिंदल स्टेनलेस के अध्यक्ष रतन जिंदल ने कहा, “अगर भारत सचमुच एक वैश्विक विनिर्माण महाशक्ति बनना चाहता है, तो स्टेनलेस स्टील उसकी सबसे मजबूत नींव में से एक होना चाहिए। 2047 तक स्टेनलेस स्टील की खपत दो करोड़ टन से अधिक होने की संभावना है, इसलिए हमें तीन मुख्य रास्तों से इस क्षेत्र को आगे बढ़ाना चाहिए। पहला, बढ़ती मांग को पूरा करने के लिए अपनी उत्पादन क्षमता बढ़ानी चाहिए। दूसरा, अनुसंधान में निवेश करना, डिजिटल तकनीक का उपयोग बढ़ाना, उद्योग और शिक्षा संस्थानों के बीच सहयोग बढ़ाना, और टिकाऊ उत्पादन को बढ़ावा देना जरूरी है। तीसरा, सरकार के साथ मिलकर खासकर छोटे और मध्यम उद्योगों (एमएसएमई) के लिए समान अवसर बनाए रखना चाहिए, और चीन से सस्ते और सब्सिडी वाले आयातों को रोकने के लिए प्रभावी कदम उठाने चाहिए, खासकर जब ये माल वियतनाम जैसे देशों के जरिए आते हैं। मैं सरकार के समर्थन की सराहना करता हूँ, जिन्होंने मेक इन इंडिया, गुणवत्ता मानक और बुनियादी ढांचे में निवेश से इस क्षेत्र को मजबूत किया है। हमारे उद्योग के भविष्य को सुरक्षित करने के लिए एक राष्ट्रीय स्टेनलेस स्टील नीति की तत्काल जरूरत है, जो कच्चा माल उपलब्ध कराए, दीर्घकालिक विकास को बढ़ावा दे और खासकर एमएसएमई को संसाधन उपलब्ध कराए। इन कदमों से भारत जल्दी ही टिकाऊ और उच्च गुणवत्ता वाले स्टेनलेस स्टील के उत्पादन में विश्व में नेतृत्व करेगा।”
यह वृद्धि भारत में स्टेनलेस स्टील निर्माण में क्षमता और योग्यता दोनों के मामले में की गई निरंतर प्रगति का परिणाम है, जो राष्ट्र निर्माण में धातु की महत्वपूर्ण भूमिका को रेखांकित करता है और भारत को 2047 के आत्मनिर्भर और विकसित भारत लक्ष्यों को प्राप्त करने में मदद कर रहा है। वित्त वर्ष 2025 में, भारतीय स्टेनलेस स्टील उद्योग ने घरेलू मांग में उल्लेखनीय वृद्धि का अनुभव किया, जिसे ‘मेक इन इंडिया’ जैसी सरकारी पहलों और स्टेनलेस स्टील के बढ़ते उपयोग के विस्तार से समर्थन मिला। देश की 11,000 किलोमीटर की तटरेखा पर स्टेनलेस स्टील को बढ़ावा देने पर सरकार की पहल से बाजार की जागरूकता बढ़ रही है और तटीय तथा समुद्री बुनियादी ढांचे में पारंपरिक सामग्रियों की जगह स्टेनलेस स्टील इस्तेमाल हो रहा है। इलेक्ट्रिक वाहनों, ट्रेलरों और कंटेनरों में स्टेनलेस स्टील को अपनाने के साथ लॉजिस्टिक्स क्षेत्र भी विकास को गति दे रहा है। इसके अलावा, प्रोसेस इंडस्ट्री, हाइड्रोजन और न्यूक्लियर एनर्जी जैसे उभरते क्षेत्रों ने पर्याप्त विकास क्षमता का प्रदर्शन किया है, जो स्टेनलेस स्टील के लिए नए अवसर ला रहे हैं।
