
प्रवेश कुमार मिश्र
नई दिल्ली.
पहलगाम हमले के बाद भारत सरकार द्वारा उठाए जा रहे कठोर राजनयिक, राजनीतिक, कुटनीतिक कदमों के साथ-साथ जिस तरह से सैन्य कार्रवाई के बहुआयामी विकल्पों पर बहुस्तरीय विमर्श किया जा रहा है , उससे साफ है कि सरकार प्रतिक्रियावादी नीति के साथ आगे बढ़ने को तैयार हो गई है.
सूत्रों की मानें तो जहां एक तरफ सर्वदलीय बैठक के माध्यम से आंतरिक राजनीतिक एकजुटता का प्रदर्शन किया जा रहा है वहीं दूसरी ओर विदेश मंत्रालय विभिन्न देशों में मौजूद राजनयिकों के साथ विस्तृत मंथन कर उनके माध्यम से विश्व के तमाम मित्र व अन्य देशों को आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई के पहले भारत के साथ एक मंच पर लाने की तैयारी की जा रही है. इतना ही नहीं तीनों सेनाओं की ओर से बहुस्तरीय तैयारियों को मूर्तरूप भी दिया जा रहा है.सूत्रों की मानें तो जिस तरह से प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में हुई सीसीएस की बैठक में पाकिस्तान के खिलाफ पांच निर्णयों को अमली जामा पहनाया गया वह सिर्फ भविष्य में उठाए जाने वाले कदमों की बानगी मात्र है. क्योंकि प्रधानमंत्री ने बिहार में आयोजित सभा में जिस तरह की शब्दावली का प्रयोग किया और भाषण के मध्य में विश्व को संदेश देने के लिए अंग्रेजी में संबोधित किया, उससे साफ है कि बहुस्तरीय मोर्चाबंदी की ओर सरकार बढ़ गई है.सूत्र बता रहे हैं कि पहले बिहार में पंचायती राज दिवस पर आयोजित कार्यक्रम को स्थगित करने का निर्णय हुआ था लेकिन कल शाम में रणनीतिक परिस्थितियों को आधार बनाकर कार्यक्रम को कराने पर सहमति बनी. संभवतः इसी वजह से बिहार की रैली में मोदी ने अपने भाषण को सरकार की विकासवादी नीति पर केंद्रित रखते हुए पहलगाम घटना का जिक्र के साथ चेतावनी भरे कड़े अंदाज में पड़ोसी देश व आतंकवादियों को संदेश दिया है.सूत्रों की मानें तो राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजित डोभाल ने भी विभिन्न एजेंसियों के विशेषज्ञों व महत्वपूर्ण पदधारियों के साथ कई दौर की बैठक करते हुए आंतरिक सुरक्षा और सीमावर्ती इलाकों में चल रहे बहुस्तरीय तैयारियों की समीक्षा की है. रेलवे व खाद्य आपूर्ति समेत विभिन्न मंत्रालयों में भी भविष्य की तैयारियों के संबंध में बैठकों दौर चलता रहा है.सूत्रों की मानें तो कारगिल युद्ध के बाद पहली बार इस तरह की तैयारियां दिख रही है. भविष्य की रणनीति को गोपनीय रखने के लिए भी योजनाबद्ध रणनीति बनाई गई है. इसलिए औपचारिक रूप से कोई भी कुछ बोलने को तैयार नहीं है.
कश्मीरियों के रूख में आए बदलाव पर सरकार की नजर
पहलगाम हमले के बाद संभवतः पहली बार जम्मू-कश्मीर में आम लोगों ने जिस तरह से आतंकवाद व आतंकवादियों के खिलाफ आवाज बुलंद की है उसको एक बड़े राजनीतिक बदलाव के तौर पर देखा जा रहा है. केन्द्र सरकार में पदस्थ कई वरिष्ठ अधिकारी जम्मू-कश्मीर के आम लोगों के मन में आए इस तरह के बदलाव को बड़े संकेत के रूप में देख रहे हैं. उनका मानना है कि जम्मू कश्मीर के लोगों को लगने लगा है कि आतंकवाद के परोक्ष समर्थन से उनका भला नहीं होने वाला है. इतना ही नहीं पिछले चार-पांच सालों में जिस तरह से पर्यटक वहां पहुंच रहे थे उससे उनकी आर्थिक स्थिति में भी भारी बदलाव आया था. इसलिए अब यह उम्मीद जताई जा रही है कि कुछ हद तक लड़ाई आंतरिक नहीं रह गई है बल्कि स्थानीय लोग अपने भविष्य को सुदृढ़ करने के लिए आतंकवाद के खिलाफ सरकार की आक्रामक नीतियों का आगे बढ़कर समर्थन कर सकते हैं.
