देशभर में घटित हाल की घटनाएं स्पष्ट रूप से दर्शाती हैं कि हमें पुलिस सुधारों की सख्त जरूरत है. हाल ही में कर्नाटक, उड़ीसा और बिहार में अनेक बार वहां की पुलिस पर हमले हुए हैं. जबकि मध्य प्रदेश में भी मार्च महीने में ही छह बार पुलिस पर हमले की घटनाएं हुई हैं. पहली घटना मऊगंज की है जहां अपराधी को पकडऩे गए सहायक पुलिस उप निरीक्षक (एएसआई) रामचरण की मौत हो गई. इसके बाद इंदौर के परदेशीपुरा में होली के बाद गुब्बारे फेंकने के विवाद में वकील और राहगीरों के बीच विवाद हो गया. इस विवाद की तफ्तीश करने गए थाना प्रभारी जितेंद्र यादव को उस वकील ने और उसके साथियों ने दौड़ा-दौड़ा कर मारने की कोशिश की. इसी तरह शहडोल में महिला कांस्टेबल सहित तीन पुलिस कर्मियों पर अपराधियों की एक गैंग ने हमला कर दिया. सीहोर के इछावर में सब इंस्पेक्टर धुर्वे और दो आरक्षकों पर भी हमला हुआ. इसी तरह की घटना दमोह के हिंडोरिया में दोहराई गई,जहां थाना प्रभारी धर्मेंद्र गुर्जर पर एक कुख्यात बदमाश ने फायरिंग कर दी. सागर के सुरखी में प्रधान आरक्षक पर कुल्हाड़ी से हमला किया गया. ग्वालियर और चंबल अंचल में रेत माफिया और महाकौशल से लेकर निमाड़ के बुरहानपुर नेपानगर क्षेत्र में जंगल माफिया अनेक बार पुलिस पर हमला कर चुका है. इसके विपरीत ऐसी घटनाएं भी बढ़ती जा रही हैं जहां पुलिसकर्मी खुद अपराधों में शामिल हैं. जाहिर है सभी घटनाओं का न्यायिक और प्रशासनिक दृष्टि से विश्लेषण तो करना ही होगा. साथ ही यह भी देखना होगा कि कहीं काम की अधिकता का तनाव और अवसाद पुलिस की कार्य क्षमता को प्रभावित तो नहीं कर रहा है ? इसके अलावा पुलिस के लिए एक ऐसा मेकैनिज्म और सिस्टम तैयार करना भी एक चुनौती है जिसमें उनका कामकाज नेताओं के दखल से बचा रहे. दरअसल राजनीतिक दबाव भी पुलिस तंत्र की कार्य क्षमता को प्रभावित करता है. जब राजनीतिक दबाव की बात होती है तो इसका मतलब संबंधित राज्य के सत्तारूढ़ दल के नेताओं से होता है. वस्तुत: राजनीतिक दबाव ही वह चुनौती है, जिसकी वजह से पुलिस को कार्यक्षम बनाने के लिए उठाए गए सारे कदम धरे के धरे रह जाते हैं.जाहिर है देश में पुलिस सुधार सुधारों की बेहद जरूरत है.यह सुधार समग्र रूप से होने चाहिए. यानी जहां एक तरफ पुलिस को जनता के प्रति जवाबदेह और अपराध के प्रति कठोर बनाने की जरूरत है तो दूसरी तरफ पुलिस बल की संख्या में वृद्धि करके, उन्हें अत्याधुनिक संसाधनों से लैस और प्रशिक्षित करना तथा वेतन और सुविधाएं बढ़ाना भी उतना ही जरूरी है. इसके अलावा मध्य प्रदेश में आधे अधूरे ढंग से लागू पुलिस कमिश्नर प्रणाली की भी गंभीर समीक्षा जरूरी है. फिलहाल मध्य प्रदेश में इंदौर और भोपाल में कमिश्नर प्रणाली लागू की गई है, लेकिन इस सिस्टम के अनुकूल परिणाम प्राप्त नहीं हुए हैं, जबकि देश के मुंबई,दिल्ली, कोलकाता और चेन्नई जैसे महानगरों में पुलिस कमिश्नर सिस्टम अपेक्षाकृत प्रभावी ढंग से काम कर रहा है. मध्यप्रदेश की कमिश्नर प्रणाली में पुलिस कमिश्नर को पूरे अधिकार नहीं दिए गए हैं. इस वजह से यह प्रणाली अपेक्षित सफलता प्राप्त नहीं कर पा रही है. कमलनाथ सरकार ने पुलिसकर्मियों को साप्ताहिक अवकाश देने का ऐलान किया था, लेकिन यह आदेश क्रियान्वित नहीं हो पाया, क्योंकि प्रदेश में पुलिस कर्मियों की संख्या राष्ट्रीय औसत की तुलना में कम है. जाहिर है पुलिस की समस्याओं पर भी गंभीरता से विचार कर उनका हल निकालना होगा. दरअसल यह कठोर हकीकत है कि सुशासन की अवधारणा बिना पुलिस सुधारों के फलीभूत नहीं हो सकती. इसलिए पुलिस सुधार समय की आवश्यकता है.
