गणगौर के गीतों से कुक्षी में छाया उल्लास

कुक्षी। इस समय गणगौर पर्व का उत्साह भरा वातावरण बना हुआ है। पर्व के अन्तर्गत माता की बाड़ी में ज्वारे बोये गये है। हर दिन जल सिंचन एवं धुप ध्यान किया जा रहा है।

महिलाओं द्वारा गणगौर गीत ’’रनुबाई-रनुबाई खोलो किवाड़ो, बाहर उबा म्हे पूजन वाला ’’……।

’’जवरा-ज्वारा माता कंकुरा क्यारा, जव म्हारा लेरा लेहराया’’…..।

’’झमरालीया रो घर म्हारी माता, नेड़ो बसे के दुर ओ’’……।

’’हंस-हंस पूछे दिवाणजी वात, कण ने वाया माता रा जाग’’…….।

’’घाटी चड़ी न हव हारी म्हारी चंदा’’……..।

आदि से घर मोहल्लो को गुंजायमान बना दिया गया है।

गणगौर पर्व के दौरान सिर्वी समाज सकल पंचो के नेतृत्व मे समाज की बालिकाओं व महिलाओं के द्वारा कचहरी चौक से प्रतिदिन फुल तथा पत्तियों से श्रृंगारित पातियॉं चल समारोह के साथ लाई जा रही है। बालिकाएँ अपनी सखी सहेलियो के साथ बाग बगीचे व विशेष स्थान से ढोल व तासे के साथ फुल व पत्तियॉ से सुसज्जीत कलश को लकड़ी के बाजोट पर रख सिर पर धारण कर पाँतिया लाती है। तथा महिलाए रात्रि के समय माता की बाड़ी व घरो में झालरिये गाकर धानी, पतासे व बेर की प्रसादी का वितरण करती जिसे तम्बोल कहा जाता है। 31 मार्च को अंतिम बड़ी पाती के दिन बालिकाओं के द्वारा दुल्हा -दुल्हन बनकर विशेष श्रृंगारित पातियॉं लाई जायेगी। इस मनमोहक दृश्य को देखने नगर में भारी भीड़ उमड़ेगी।

जबकि

पर्व के दौरान नव वर्ष गुड़ी पड़वा के दिन रात मे 8 बजे सिर्वी समाज की महिलाओं द्वारा नगर के कचहरी चौक से मिट्टी के गुड़लो का पूजन कर उसमे दीप जलाकर अपने सिर पर धारण करते हुए चल समारोह के साथ घरों पर ले जाया जायेगा। जो की विवाह परम्परा का एक हिस्सा होता है।

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