अमेरिका में आज मिड-टर्म चुनाव के लिए वोटिंग, राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के दूसरे कार्यकाल पर जनमत संग्रह के रूप में देखा जा रहा मुकाबला

वॉशिंगटन,  अमेरिका में मंगलवार को हाल के वर्षों के सबसे महत्वपूर्ण मिड-टर्म (मध्यावधि) चुनावों के लिए मतदान शुरू हो गया है। इसे राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के दूसरे कार्यकाल और उनकी नीतियों पर एक बड़े जनमत संग्रह के रूप में देखा जा रहा है। बढ़ती महंगाई, ट्रेड वॉर और विदेश नीति के मुद्दों के बीच हो रहे इस चुनाव से यह तय होगा कि अमेरिकी संसद (कैपिटल) के दोनों सदनों—हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स और सीनेट—पर ट्रंप की रिपब्लिकन पार्टी का दबदबा बरकरार रहता है या डेमोक्रेट्स बहुमत हासिल करने में सफल होते हैं। चुनाव में हाउस की सभी 435 सीटों और सीनेट की 37 सीटों के अलावा 36 राज्यों के गवर्नर पदों के लिए वोट डाले जा रहे हैं।

विवेक रामास्वामी और नित्या रमन समेत कई भारतीय-अमेरिकी दिग्गज चुनावी समर में, ओबामा ने संभाला मोर्चा

इन चुनावों में भारतीय-अमेरिकी उम्मीदवारों की साख भी दांव पर लगी हुई है। ओहायो में गवर्नर पद के लिए भारतीय-अमेरिकी उद्योगपति विवेक रामास्वामी और डेमोक्रेट एमी एक्टन के बीच कड़ा मुकाबला है, वहीं लॉस एंजिल्स के मेयर पद के लिए नित्या रमन दौड़ में हैं। इसके अलावा रो खन्ना, प्रमिला जयपाल, राजा कृष्णमूर्ति और सुहास सुब्रमण्यम जैसे प्रमुख भारतीय-अमेरिकी सांसद फिर से प्रतिनिधि सभा पहुंचने की रेस में हैं। चुनाव प्रचार के आखिरी दौर में पूर्व राष्ट्रपति बराक ओबामा ने डेमोक्रेटिक रैलियों को संबोधित कर माहौल गरमाया, जबकि ट्रंप ने भी 20 राज्यों का तूफानी दौरा कर रिपब्लिकन उम्मीदवारों के पक्ष में मतदान की अपील की।

5.7 करोड़ से ज्यादा अगेती वोट पड़े, यदि डेमोक्रेट्स का कब्जा हुआ तो ट्रंप प्रशासन की राह होगी चुनौतीपूर्ण

एपी के आंकड़ों के अनुसार, मतदान के दिन से पहले ही 5.7 करोड़ से अधिक अमेरिकी अगेती (अर्ली वोटिंग) मतदान के माध्यम से अपना वोट दर्ज करा चुके हैं। यदि ओपिनियन पोल्स के अनुमान सच साबित होते हैं और डेमोक्रेटिक पार्टी हाउस या सीनेट पर नियंत्रण हासिल कर लेती है, तो राष्ट्रपति ट्रंप के लिए अपने विधायी एजेंडे को आगे बढ़ाना बेहद चुनौतीपूर्ण हो जाएगा। ऐसे में उन्हें अपने फैसलों को लागू करने के लिए कार्यकारी आदेशों और वीटो पावर का अधिक सहारा लेना पड़ सकता है। इन नतीजों का असर न केवल अमेरिकी राजनीति पर बल्कि वैश्विक अर्थव्यवस्था और अंतरराष्ट्रीय संबंधों पर भी गहराई से पड़ेगा।

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