नई दिल्ली, इजराइल के संसदीय चुनाव के आए शुरुआती रुझानों और नतीजों ने राजनीतिक हलचल तेज कर दी है। प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के नेतृत्व वाला दक्षिणपंथी गुट सबसे बड़े राजनीतिक समूह के रूप में उभरा है, लेकिन वह सरकार गठन के लिए जरूरी 61 सीटों के बहुमत के आंकड़े से पीछे रह गया है। ‘द गार्डियन’ की रिपोर्ट के अनुसार, लगभग 92 प्रतिशत मतों की गिनती के बाद नेतन्याहू के गुट को 53 सीटें, यहूदी विपक्षी गुट को 48 सीटें और अरब-नेतृत्व वाली पार्टियों को 19 सीटें मिलने का अनुमान है, जिससे देश में त्रिशंकु संसद (हंग पार्लियामेंट) जैसी स्थिति बन गई है।
अरब-नेतृत्व वाली पार्टियों के शानदार प्रदर्शन ने उलझाया राजनीतिक समीकरण, विपक्ष के साथ जाने की चर्चाएं तेज
चुनाव परिणामों में अरब-नेतृत्व वाली पार्टियों के बेहतर प्रदर्शन ने पूरे राजनीतिक समीकरण को नया मोड़ दे दिया है। यदि ये पार्टियां विपक्ष का समर्थन करती हैं, तो विपक्षी खेमा 67 सीटों तक पहुंच सकता है, जिससे सत्ता परिवर्तन की अटकलें लगाई जा रही हैं। हालांकि, चुनाव प्रचार के दौरान यहूदी विपक्ष और नेतन्याहू दोनों ही अरब दलों के साथ गठबंधन करने से बचते रहे हैं, लेकिन अरब पार्टियों ने नेतन्याहू को सत्ता से बेदखल करने की इच्छा जताई है। जेएनयू के विशेषज्ञ प्रोफेसर मुदस्सिर कमर के अनुसार, राष्ट्रपति सबसे पहले सबसे बड़े गठबंधन के नेता यानी नेतन्याहू को सरकार बनाने के लिए आमंत्रित करेंगे, जिन्हें सदन में अपना बहुमत साबित करना होगा।
नेतन्याहू के राजनीतिक कौशल और भविष्य की चुनौतियों पर टिकी नजरें, कार्यवाहक सरकार के सहारे चल सकता है प्रशासन
अपने राजनीतिक करियर में कई सियासी संकटों से पार पा चुके बेंजामिन नेतन्याहू के लिए यह स्थिति एक बड़ी चुनौती साबित हो सकती है। यदि नेतन्याहू बहुमत साबित करने में असफल रहते हैं, तो अन्य दलों के नेताओं को सरकार बनाने का मौका मिल सकता है, और जब तक नई सरकार का गठन नहीं होता, तब तक नेतन्याहू कार्यवाहक प्रधानमंत्री बने रहेंगे। जानकारों का मानना है कि इजराइल की मुख्यधारा की पार्टियां अमूमन अरब दलों के पूर्ण समर्थन से सरकार बनाने में असहज रहती हैं, जिसके चलते सैन्य नीति, बजट और गाजा के भविष्य जैसे अहम मुद्दों पर राजनीतिक अनिश्चितता और अस्थिरता का दौर लंबा खिंच सकता है।

