यरुशलम, इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू की लिकुड पार्टी ने हालिया संसदीय चुनाव के शुरुआती परिणामों के बाद बड़ा राजनीतिक विवाद खड़ा कर दिया है। पार्टी ने बुधवार को गंभीर आरोप लगाते हुए कहा कि अरब नागरिकों की ओर से कथित ‘वोटर फ्रॉड’ (वोट चोरी) और धांधली के कारण पार्टी स्पष्ट बहुमत हासिल करने से चूक गई है। चुनाव में नेतन्याहू की लिकुड पार्टी को सबसे अधिक 53 सीटें मिली हैं, जो सरकार बनाने के लिए जरूरी 61 सीटों के बहुमत के आंकड़े से 9 सीटें कम हैं। पार्टी ने चुनाव आयोग और कानून प्रवर्तन एजेंसियों से अरब बहुल मतदान केंद्रों पर गड़बड़ी के साक्ष्यों की त्वरित जांच करने की मांग की है।
सत्ता के दोनों मुख्य खेमे बहुमत से दूर, अरब पार्टियों की बढ़ी हुई सीटें सरकार गठन की प्रक्रिया को बनाएगी बेहद जटिल
इजरायल के इस त्रिशंकु चुनावी नतीजों के बाद राजनीतिक तस्वीर पूरी तरह साफ नहीं हो पाई है। नेतन्याहू का दक्षिणपंथी गठबंधन और उनके मुख्य प्रतिद्वंद्वी गादी आइजेनकोट के नेतृत्व वाला विपक्षी खेमा, दोनों ही 61 सीटों के बहुमत के जादुई आंकड़े तक नहीं पहुंच पा रहे हैं। इस चुनाव में अरब मतदाताओं की रिकॉर्ड भागीदारी देखने को मिली, जिससे अरब पार्टियों की सीटें 10 से बढ़कर लगभग 19 तक पहुंच गई हैं। जानकारों का मानना है कि खंडित जनादेश के चलते इजरायल में त्रिशंकु संसद की स्थिति बन गई है, जिससे अब नई गठबंधन सरकार के गठन के लिए लंबी और जटिल राजनीतिक वार्ताओं का दौर शुरू होगा।
नेतन्याहू ने सोशल मीडिया पर अरब मतदाताओं की भारी भागीदारी को बनाया मुद्दा, अमेरिका के आगामी राजनीतिक घटनाक्रम पर भी पड़ेगा असर
मतदान के दौरान प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने सोशल मीडिया पर आक्रामक रुख अपनाते हुए अरब मतदाताओं की भारी भागीदारी का मुद्दा उठाया था और अपने दक्षिणपंथी समर्थकों से तुरंत वोट डालने की अपील की थी। नेतन्याहू ने चेतावनी दी थी कि यदि उनके समर्थक घरों से बाहर नहीं निकले, तो विरोधी ताकतें सत्ता पर कब्जा कर लेंगी। हालांकि, इन चुनावी परिणामों ने इजरायल की राजनीति में नेतन्याहू के नेतृत्व और देश के गहरे राजनीतिक विभाजन को एक बार फिर उजागर कर दिया है। विश्लेषकों का कहना है कि इस भू-राजनीतिक उथल-पुथल का असर आगामी अमेरिकी मध्यावधि चुनावों और मध्य-पूर्व की नीतियों पर भी पड़ सकता है।

