नयी दिल्ली 23 अक्टूबर (वार्ता) भारतीय नौसेना आगामी 03 से 05 नवंबर तक यहां ‘इंडो-पैसिफिक क्षेत्रीय संवाद (आईपीआरडी-2026)’ का आयोजन करेगी जिसमें विज्ञान, प्रौद्योगिकी और शैक्षणिक सहयोग पर मंथन होगा।
रक्षा मंत्रालय ने शुक्रवार को बताया कि तीन दिन के इस अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन में 18 देशों के विशेषज्ञ समुद्री विज्ञान, तकनीक, शैक्षणिक सहयोग, महासागर प्रबंधन और जलवायु से जुड़ी चुनौतियों पर चर्चा करेंगे। सम्मेलन का मुख्य विषय ‘हिंद-प्रशांत क्षेत्र में विज्ञान, तकनीक और शैक्षणिक सहयोग’ है। इसका आयोजन नेशनल मैरीटाइम फाउंडेशन के साथ मिलकर किया जाएगा।
भारतीय नौसेना का यह वार्षिक उच्चस्तरीय अंतरराष्ट्रीय संवाद हिंद-प्रशांत क्षेत्र में सहयोग के लिए ठोस सुझाव तैयार करने पर केंद्रित होगा। इसका उद्देश्य हिंद-प्रशांत महासागर पहल (आईपीओआई) के व्यापक सहयोग ढांचे को ऐसे व्यावहारिक प्रस्तावों में बदलना है, जिन पर अमल किया जा सके। आईपीओआई की घोषणा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नवंबर 2019 में बैंकॉक में 14वें पूर्वी एशिया शिखर सम्मेलन में की थी। यह संवाद भारत की ‘महासागर’ यानी क्षेत्रीय सुरक्षा और विकास को साझा रूप से आगे बढ़ाने की समुद्री सोच से भी जुड़ा है।
सम्मेलन में पांच प्रमुख विषयों पर चर्चा होगी। इनमें शैक्षणिक नेटवर्क, शोध और कौशल विकास; समुद्री गतिविधियों की जानकारी और अहम समुद्री ढांचे की सुरक्षा, समुद्र विज्ञान और जलवायु से निपटने की क्षमता, महासागर प्रबंधन में साझा प्रयास तथा नयी समुद्री तकनीकों और उनके दोहरे उपयोग से जुड़े पहलू शामिल हैं। इन चर्चाओं में संयुक्त शोध, तकनीक के साझा विकास, वैज्ञानिक आंकड़ों तक उचित पहुंच और संस्थानों के बीच साझेदारी बढ़ाने के उपायों पर विचार किया जायेगा।
सम्मेलन के पहले दिन ‘पर्सपेक्टिव्स फ्रॉम द फ्लैग ब्रिज’ नाम से विशेष सत्र होगा, जिसमें भारत और श्रीलंका के पूर्व नौसेना प्रमुख हिस्सा लेंगे। इसके अलावा ‘सहयोग का संवाद’ नाम से राजदूतों के साथ विशेष चर्चा भी होगी। रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह पहले दिन स्मृति संबोधन करेंगे। तीन दिन के कार्यक्रम में मंत्री और अन्य विशेषज्ञों का भी संबोधन होगा। इसमें समुद्री क्षेत्र से जुड़े पेशेवरों, वैज्ञानिकों, शिक्षाविदों, नीति-निर्माताओं और विशेषज्ञों की भागीदारी होगी।
इस संवाद का उद्देश्य राष्ट्रीय, उपक्षेत्रीय और पूरे हिंद-प्रशांत क्षेत्र के स्तर पर ऐसे ठोस कदमों की पहचान करना है, जिन्हें द्विपक्षीय, त्रिपक्षीय और बहुपक्षीय सहयोग के मौजूदा माध्यमों से आगे बढ़ाया जा सके। इसके जरिए क्षेत्र में आपसी समझ, सहयोग और साझेदारी को मजबूत करने पर जोर दिया जायेगा।

