नयी दिल्ली, 10 अक्टूबर (वार्ता) दिल्ली सरकार ने पात्र निजी कृषि भूमि पर व्यावसायिक रूप से उगाई जाने वाली पांच प्रजातियों के पेड़ काटने के लिए पहले से अनुमति लेने की अनिवार्यता समाप्त कर दी है। इसके स्थान पर ऑनलाइन पंजीकरण की व्यवस्था लागू की गई है और मंजूरी देने के लिए समयसीमा तय की गई है। दिल्ली पेड़ संरक्षण (कृषि-वानिकी और छूट प्राप्त वृक्ष प्रजातियां) नियम, 2026 को 30 सितंबर को दिल्ली पेड़ संरक्षण अधिनियम, 1994 की धारा 29 और 34 के तहत अधिसूचित किया गया था। इन्हें दिल्ली राजपत्र (असाधारण) में प्रकाशित किया गया था।
नियम 4 के अनुसार, सूचीबद्ध प्रजातियों के पेड़ों को काटने, हटाने या उनका निपटान करने के लिए अधिनियम की धारा 5 और 6 के तहत पहले से अनुमति लेने की जरूरत नहीं होगी। हालांकि, यह छूट इन नियमों के अधीन होगी। पेड़ों के मालिकों को अपने पौधरोपण का पंजीकरण कराना होगा और नियम 7 तथा 8 के तहत सूचना देने और अनुमति लेने की प्रक्रिया का पालन करना होगा।
अनुसूची-1 में पांच प्रजातियों के पेड़ों को शामिल किया गया है। इनमें पॉपलर (पोपुलस डेल्टॉइड्स), सफेदा या यूकेलिप्टस, सहजन (मोरिंगा ओलीफेरा), गमारी (गमेलिना अर्बोरिया) और मालाबार नीम (मेलिया डुबिया) शामिल हैं।
10 पेड़ों तक की कटाई के लिए मालिक को ई-फॉरेस्ट पोर्टल पर पौधरोपण पंजीकरण प्रमाणपत्र और पेड़ों की भू-चिह्नित तस्वीरें अपलोड करनी होंगी। यदि कोई आपत्ति दर्ज नहीं होती है, तो वृक्ष अधिकारी को सात कार्य दिवसों के भीतर अनुमति जारी करनी होगी। दस से अधिक पेड़ों की कटाई के लिए मालिक को पोर्टल पर सूचना देनी होगी। वृक्ष अधिकारी को 14 कार्य दिवसों के भीतर स्थल का निरीक्षण करना होगा। यदि इस अवधि में कोई आपत्ति दर्ज नहीं होती है, तो तीन सप्ताह के भीतर अनुमति जारी करनी होगी। आपत्ति केवल नियमों के उल्लंघन, किसी अन्य कानून के उल्लंघन या अदालत अथवा न्यायाधिकरण के आदेश के आधार पर ही दर्ज की जा सकेगी।
सरकार के नियम 9 के तहत, सूची में शामिल प्रजातियों की लकड़ी को दिल्ली के अंदर या बाहर बिना किसी अलग ‘ट्रांज़िट परमिट’ के ले जाया जा सकता है। नियमों में कहा गया है कि पेड़ काटने की मंज़ूरी ही “लकड़ी के लिए वैध परिवहन दस्तावेज का काम करेगा ।” गलत इस्तेमाल को रोकने के लिए औचक जांच की जा सकती है। नियम 10 के तहत, नियमों के अनुसार काटे गए पेड़ों के मामले में ” अधिनियम की धारा 8 के तहत मुआवज़े के तौर पर पेड़ लगाने की ज़रूरत नहीं होगी।” मालिकों को ई- फॉरेस्ट पोर्टल पर अपने पेड़-पौधों (प्लांटेशन) का पंजीकरण कराना होगा। उन्हें मालिकाना हक के दस्तावेज , जियो-टैग की गई तस्वीरें, ज़मीन की केएमएल फ़ाइल और पेड़ों की प्रजाति एवं संख्या की जानकारी देनी होगी। इसके बाद पोर्टल अपने-आप वृक्षारोपण पंजीयन प्रमाण पत्र जारी कर देगा। नियमों में निजी ज़मीन का मतलब ऐसी कृषि ज़मीन है जो किसी व्यक्ति, परिवार, ट्रस्ट, सोसाइटी या निजी संस्था के मालिकाना हक में हो, उनके पास हो या कानूनी तौर पर उनके कब्ज़े में हो।
केंद्र, दिल्ली सरकार या किसी स्थानीयय प्रशासन के अधिकार वाली ज़मीन इसमें शामिल नहीं है। जंगल, रिज इलाके और ‘डीम्ड फॉरेस्ट’ (जिन्हें जंगल माना गया है) इन नियमों के दायरे से बाहर हैं। साथ ही, ऐसी कोई भी ज़मीन जहाँ कानून या कोर्ट/ट्रिब्यूनल के आदेश से पेड़ काटने पर रोक या पाबंदी है, वह भी इसके दायरे में नहीं आती।
यह छूट उन मामलों में लागू नहीं होगी जिनमें जंगल का दर्जा (स्टेटस) विवादित हो, पर्यावरण से जुड़े नियमों का उल्लंघन हुआ हो, मुआवज़े के तौर पर पेड़ लगाने की ज़िम्मेदारी हो या कोर्ट के पहले से कोई आदेश मौजूद हों। जंगल, पर्यावरण और वन्यजीवों से जुड़े अन्य कानून लागू रहेंगे।
अधिसूचना में कहा गया है कि मौजूदा मंज़ूरी और परिवहन से जुड़ी प्रक्रियाओं की वजह से निजी ज़मीन के मालिक एग्रो-फॉरेस्ट्री या कमर्शियल इस्तेमाल के लिए पेड़ लगाने से हिचकिचाते थे। इसमें कहा गया है कि एक आसान, भरोसेमंद और पारदर्शी सिस्टम न होने की वजह से उन्हें ऐसा करने के लिए कोई प्रोत्साहन नहीं मिलता था। इसमें एग्रो-फॉरेस्ट्री को हरियाली बढ़ाने, कार्बन सोखने, लकड़ी और बायोमास की सप्लाई, प्राकृतिक जंगलों पर दबाव कम करने, आजीविका और क्लाइमेट चेंज के असर को कम करने के लिए ज़रूरी बताया गया है। इसमें केंद्रीय पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय की ओर से जारी मॉडल नियमों और गाइडलाइंस का भी ज़िक्र किया गया है।

