
झाबुआ. मध्य प्रदेश के आदिवासी बाहुल्य झाबुआ जिले से एक बार फिर आदिवासियों का काम की तलाश में जिले से बाहर पलायन प्रारंभ हो गया है। प्रतिदिन मेघनगर, थांदला रोड, पंचपिपलिया, बामनिया, भेरूगढ़ आदि रेलवे स्टेशनों से बड़ी संख्या में आदिवासी अपने परिवारों सहित काम की तलाश में अन्य राज्यों की ओर रुख करने लगे हैं। इनमें गुजरात, राजस्थान सहित मध्य प्रदेश के अन्य जिले भी शामिल हैं।
झाबुआ जिले में इस वर्ष कम वर्षा होने तथा फसलों की कटाई के साथ ही जिले में रोजगार का अभाव भी प्रारंभ हो जाता है। ऐसे में आदिवासी वर्ग के सामने काम-काज की कमी हो जाती है। परिवार के भरण-पोषण और अधिक मजदूरी की तलाश में लोग अपने परिवारों सहित अन्य राज्यों में पलायन करने को मजबूर हो जाते हैं। जिले में रोजगार गारंटी योजना के अंतर्गत भी इतने काम नहीं चलते कि सभी आदिवासियों को पर्याप्त रोजगार मुहैया कराया जा सके।
जिले में इस साल वैसे ही मानसून सत्र में 31 प्रतिशत कम वर्षा दर्ज की गई है, जिसके चलते फसलों पर भी प्रभाव पड़ा है। आने वाले सीजन में गेहूं और चने की फसलें भी प्रभावित होने की संभावना है। पानी की कमी के चलते मवेशियों के लिए भी आने वाले समय में चारा और पानी का संकट रहने की आशंका है। ऐसे में आदिवासियों ने अभी से अपने परिवारों सहित जिले से बाहर अन्य जिलों और राज्यों का रुख कर लिया है।
अब इनमें से अधिकांश आदिवासी या तो दीपावली के समय या फिर सीधे होली के अवसर पर भगोरिया हाट के दौरान ही वापस अपने घर और जिले का रुख करेंगे। लंबे समय तक परिवारों के साथ पलायन करने के कारण गांवों में बुजुर्गों, महिलाओं और बच्चों के सामने भी कई तरह की समस्याएं खड़ी हो जाती हैं।
आदिवासियों के पलायन को रोकने के लिए प्रदेश सरकार द्वारा फिलहाल ऐसे प्रभावी कदम उठाए जाते नजर नहीं आ रहे हैं, जिससे आदिवासियों को झाबुआ जिले में ही पर्याप्त रोजगार मिल सके। स्थानीय स्तर पर रोजगार के अवसर उपलब्ध नहीं होने के कारण मजदूरों को मजबूरी में दूसरे राज्यों का रुख करना पड़ रहा है।
इसी प्रकार के हालात आलीराजपुर जिले में भी बने हुए हैं, जहां इस साल मानसून सत्र में 51 प्रतिशत कम बारिश दर्ज की गई है। झाबुआ और आलीराजपुर जिलों में वर्षा, फसलों की स्थिति और रोजगार के अवसरों के आधार पर प्रशासन की रिपोर्ट आने के बाद प्रदेश सरकार सूखे की स्थिति का आकलन कर इन्हें सूखाग्रस्त घोषित करने की दिशा में निर्णय ले सकती है।
लेकिन तब तक शायद बहुत देर हो चुकी होगी। आदिवासी मजदूरों को आज ही रोजगार की जरूरत है। यही कारण है कि वे झाबुआ और आलीराजपुर जिलों से अन्य राज्यों की ओर काम की तलाश में जाने को विवश हैं। पलायन केवल रोजगार का विषय नहीं, बल्कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था और परिवारों के भविष्य से भी जुड़ा गंभीर मुद्दा है।
जिले के जनप्रतिनिधियों और राजनीतिज्ञों को इस ओर गंभीरता से ध्यान देकर प्रदेश सरकार का ध्यान आकृष्ट करना चाहिए। साथ ही आदिवासी मजदूरों के लिए स्थानीय स्तर पर पर्याप्त रोजगार उपलब्ध कराने, रोजगार गारंटी योजना में अधिक काम स्वीकृत करने तथा सूखे की संभावित स्थिति को देखते हुए विशेष रोजगार एवं राहत कार्य प्रारंभ करने की मांग सरकार से की जानी चाहिए।
