दरवाजे पर चुनाव, बसपा में बढ़ा पारिवारिक तनाव 

दिल्ली डायरी 

 

प्रवेश कुमार मिश्र 

 

उत्तर प्रदेश में चुनावी बिगुल फूंकने की तैयारियां तेज हैं, लेकिन बसपा के भीतर की सियासी सुगबुगाहट कुछ और ही कहानी बयां कर रही है. चर्चा है कि जैसे-जैसे चुनाव दरवाजे पर दस्तक दे रहे हैं, पार्टी के भीतर पारिवारिक तनाव और वर्चस्व की अंदरूनी लड़ाई गहरी होती जा रही है. कहा जा रहा है कि उत्तराधिकार, परिवार के सदस्यों के सांगठनिक भूमिकाओं और टिकट बंटवारे को लेकर पार्टी के भीतर जबरदस्त तनाव है. इस तनाव का मुख्य केंद्र मायावती व उनके भतीजे आकाश आनंद और उनके ससुर हैं. उत्तराधिकार की इस कतार में युवाओं को आगे बढ़ाने की कवायद और परिवार के भीतर ही प्रभाव जमाने की इस खींचतान ने पुराने वफादारों को भी असमंजस में डाल दिया है. चुनावी चौखट पर खड़े संगठन के सामने यह आंतरिक घमासान ऐसे समय पर उभरा है जब बसपा को जमीन पर अपनी पकड़ मजबूत करने के लिए एकजुटता की जरूरत थी.

पायलट के जाते ही दुरूस्त हुआ पंजाब का कांग्रेसी कारवां 

पंजाब कांग्रेस के सियासी गलियारों में इन दिनों पार्टी महासचिव सचिन पायलट की उपस्थिति और सख्ती से माहौल बदल गया है. कल तक पार्टी संगठन में तू तू मैं मैं को हवा देने वाले नेताओं की हवा खराब होने लगी है. राजनीतिक हलकों में यह चुटकी खूब ली जा रही है कि पंजाब पहुंचते ही पायलट ने बगावती सुरों और गुटबाजी को थामने के लिए गियर बदल दिया है. जिसके कारण पार्टी नेता राजा वड़िंग और चरणजीत सिंह चन्नी के गुटों के बीच चल रही अंदरूनी खींचतान को पीछे छोड़ अब एक ही मंच पर आने को मजबूर दिख रहे हैं, जिससे बिखरा हुआ कांग्रेसी कारवां कुछ हद तक दुरुस्त होता नजर आ रहा है. चुनावी रण में उतरने से ठीक पहले पंजाब में ऑल इज वेल के साथ कांग्रेस राहुल गांधी की बस यात्रा आरंभ करने और ड्रग्स संकट के खिलाफ बड़े प्रदर्शन कर पंजाब के कोने-कोने में चुनावी माहौल बनाने की कोशिश की जा रही है. चर्चा है कि पायलट के सख्त व अनुशासित अभियान से जहां एक तरफ कांग्रेस पार्टी के अंदर गुटबाजी समाप्त होने लगी है वहीं दूसरी ओर सत्ताधारी आम आदमी पार्टी कांग्रेसी एकजुटता के कारण चौतरफा घिरने लगी है.

बहुस्तरीय साक्षात्कार के बाद चुने जाएंगे कांग्रेसी सचिव

कांग्रेस में अब संगठन के भीतर एंट्री पाना इतना आसान नहीं होगा. पार्टी के भीतर सांगठनिक बदलावों और आगामी चुनावों की तैयारियों के बीच पैराशूट लैंडिंग बंद होता दिख रहा है.कांग्रेस आलाकमान अब सिर्फ सिफारिश के दम पर पद पाने की परंपरा को पूरी तरह खत्म करने के मूड में है. नए सचिवों के चयन के लिए बकायदा एक खाका तैयार किया गया है, जिसके तहत उम्मीदवारों को कई दौर के कड़े इंटरव्यू और जमीनी फीडबैक की प्रक्रियाओं से गुजरना पड़ रहा है. सबसे दिलचस्प बात यह है कि राहुल गांधी खुद भी इन साक्षात्कारों के दौरान मौजूद रह रहे हैं. उम्मीदवारों की संगठनात्मक क्षमता,वैचारिक स्पष्टता तथा संकट प्रबंधन की योग्यता को व्यक्तिगत रूप से परख रहे हैं. चुनावी समर से ठीक पहले संगठन को पूरी तरह प्रोफेशनल और जवाबदेह बनाने की इस नई प्रक्रिया ने पार्टी के भीतर सिर्फ सिफारिश के भरोसे बैठे नेताओं की धड़कनें बढ़ा दी है.

बिहार में फिर बिखरा विपक्षी कुनबा 

बिहार की सियासत में गठबंधन बनने और बिगड़ने का सिलसिला कोई नया नहीं है लेकिन विधानसभा चुनाव में मिले पराजय के बाद एकजुट रहने की बात करने वाले महागठबंधन के साथी विधानपरिषद चुनाव के ठीक पहले अपनी डफली अपना राग अलापना शुरू कर रहे हैं. सहयोगियों में मची इस खलबली का मुख्य कारण आरजेडी द्वारा कांग्रेस व अन्य घटक दलों से बिना गंभीर विचार-विमर्श किए एकतरफा उम्मीदवारों की पहली सूची जारी करना बताया जा रहा है. आरजेडी ने कुल आठ में से छः सीटों पर अपने प्रत्याशियों का ऐलान कर दिया है, जिससे नाराज कांग्रेस खेमे में तेजस्वी की मनमर्जी को लेकर बगावती सुर तेज होने लगे हैं. सीटों के इस अनुचित तालमेल और क्षेत्रीय वर्चस्व की लड़ाई के कारण महागठबंधन के भीतर अविश्वास की खाई और चौड़ी हो गई है. हालांकि कांग्रेस पार्टी के राष्ट्रीय नेतृत्व की ओर से सुलह की कोशिश की जा रही है ताकि केन्द्र के इंडिया समूह को एकजुट रखा जा सके.

टीएमसी से अलग हुए सांसद बगलें झांकने पर मजबूर 

पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के बाद टीएमसी से नाता तोड़कर एक छोटे राजनीतिक दल एनसीपीआई का दामन थामने वाले 20 बागी सांसदों की मुश्किलें कम होने का नाम नहीं ले रही है. राजनीतिक गलियारों में इस बात की चर्चा बेहद गर्म है कि खुद को सुरक्षित मान रहे ये सांसद अब राज्य के आगामी स्थानीय निकाय और कोलकाता नगर निगम चुनावों की आहट के बीच बगलें झांकने पर मजबूर हो गए हैं. चर्चा है कि इन बागियों को सबसे बड़ा झटका भाजपा द्वारा स्थानीय निकाय चुनाव में उनके क्षेत्र विशेष में भी खास तवज्जो नहीं देने से लगा है. क्योंकि भाजपा का प्रदेश नेतृत्व अपने कैडर को तरजीह दे रहा है और इन दलबदलुओं को स्थानीय स्तर पर महत्व देने के मूड में बिल्कुल नहीं है. हालांकि दिल्ली की राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि उपेक्षा को देखते हुए बीस में से सत्रह सांसद अब एनसीपीआई को छोड़ भाजपा में शामिल होने की तैयारी में हैं.

Next Post

दसगात्र कार्यक्रम में गिरी आकाशीय बिजली, सात लोग झुलसे

Wed Sep 16 , 2026
सिंगरौली। जिले के जियावन थाना क्षेत्र अंतर्गत कुंदवार चौकी के टिकट गांव में बुधवार को दसगात्र कार्यक्रम के दौरान अचानक आकाशीय बिजली गिरने से बड़ा हादसा हो गया। बिजली की चपेट में आने से सात लोग झुलसकर घायल हो गए। घायलों में आठ वर्ष की बच्ची समेत दो नाबालिग लड़कियां […]

You May Like