इंदौर:वर्ल्ड एसोसिएशन ऑफ हिंदू एकेडेमिशियन्स (डब्ल्यूएएचए) की ओर से शनिवार को डेली कॉलेज में एक दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी द राइजिंग भारतः ज्ञानं परमं बलम्’ का आयोजन किया गया. संगोष्ठी में देशभर से प्रतिष्ठित शिक्षाविद्, चिंतक, नीति-विशेषज्ञ और विभिन्न क्षेत्रों के विद्वान शामिल हुए. कार्यक्रम में 600 से अधिक पीएचडी धारकों ने भी सहभागिता की.
संगोष्ठी में भारत की वैचारिक, सांस्कृतिक और बौद्धिक शक्ति को समकालीन विमर्श के केंद्र में रखते हुए विभिन्न विषयों पर विचार-विमर्श किया गया. वक्ताओं ने भारत की ज्ञान परंपरा, सामाजिक संरचना, सांस्कृतिक पहचान और वैश्विक परिदृश्य में भारत की भूमिका पर अपने विचार रखे. संगोष्ठी के मुख्य वक्ता एवं विश्व हिंदू परिषद के अखिल भारतीय संगठन मंत्री मिलिंद परांडे ने कहा कि महर्षि अरविंद के विचारों के अनुरूप भारत को विश्व का मार्गदर्शन करना है और देश उसी दिशा में आगे बढ़ रहा है. उन्होंने कहा कि समाज के सामने मौजूद वैचारिक चुनौतियों का सामना करने के लिए पूरे समाज को अपना राष्ट्रीय चरित्र मजबूत करना होगा.
महिला विमर्श में भारतीय चिंतन पर चर्चा
महिला विमर्श सत्र में ‘भारतीय चिंतन और वर्तमान’ विषय पर चर्चा हुई. डॉ. नुपुर निखिल देशकर ने कहा कि भारतीय संस्कृति में नारी सम्मान की परंपरा प्राचीन काल से रही है. उन्होंने कहा कि महिलाओं ने गृह कार्य के साथ सामाजिक दायित्व, अर्थव्यवस्था, प्रबंधन, शक्ति प्रदर्शन और वैचारिक क्षेत्रों में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है.
जनजातीय समाज की सांस्कृतिक पहचान पर मंथन
जनजातीय विमर्श सत्र में प्रकाश उइके और लक्ष्मण सिंह मरकाम ने जनजातीय समाज की सांस्कृतिक पहचान और समकालीन चुनौतियों पर विचार रखे. वक्ताओं ने जनजातीय समाज की परंपराओं, सांस्कृतिक विरासत और वर्तमान समय में उसके समक्ष उत्पन्न चुनौतियों पर चर्चा की.
भारतीय अर्थव्यवस्था और वैश्विक बाजार पर चर्चा
‘भारतीय अर्थव्यवस्था एवं ग्लोबल मार्केट फोर्सेज’ विषय पर आयोजित सत्र में प्रफुल्ल केतकर और जितेंद्र गुप्ता ने विचार साझा किए. इस दौरान वैश्विक आर्थिक परिस्थितियों, बाजार की बदलती शक्तियों और भारत की अर्थव्यवस्था की संभावनाओं पर विमर्श किया गया. कार्यक्रम में संत ओमानंद महाराज, विनोद अग्रवाल, पद्मश्री कालूराम बामनिया, भालचंद्र दत्तात्रय मोंडे, डॉ. राकेश सिंघाई, डॉ. राजेश चावला और विक्रम सिंह पवार सहित अन्य गणमान्यजन मंचासीन रहे. राष्ट्रीय संगोष्ठी का उद्देश्य भारत की ज्ञान परंपरा, सांस्कृतिक विरासत और बौद्धिक चिंतन को समकालीन संदर्भों से जोड़ते हुए देश की वैश्विक भूमिका पर सार्थक विमर्श को आगे बढ़ाना रहा
