भोपाल।14 साल पहले जब ब्रेन हेमरेज ने जिंदगी छीनने की कोशिश की, तब अनिल विश्वकर्मा ने मौत से लड़कर वापसी की थी। चार महीने अस्पताल में रहने के बाद वे फिर वर्दी में लौटे। शरीर का बायां हिस्सा आज भी लकवे से प्रभावित है, लेकिन जिम्मेदारियां निभाने का जज्बा कभी कम नहीं हुआ। विडंबना यह है कि जिस अफसर ने बीमारी के आगे हार नहीं मानी, वह आज अपने ही विभाग में प्रमोशन के लिए नियमों और कागजी प्रक्रियाओं से जूझ रहा है। भोपाल पुलिस मुख्यालय की आर्मरी शाखा में कार्यवाहक डीएसपी के रूप में पदस्थ अनिल विश्वकर्मा की कहानी सिर्फ एक अधिकारी की नहीं, बल्कि उस संघर्ष की है जिसमें इंसान शारीरिक चुनौतियों को तो मात दे देता है, लेकिन व्यवस्था के सामने बेबस नजर आता है। साल 2011 में उन्हें अचानक गंभीर ब्रेन हेमरेज हुआ। हालत इतनी नाजुक थी कि परिवार और सहकर्मियों ने उम्मीद लगभग छोड़ दी थी। चार महीने तक अस्पताल में जिंदगी और मौत की लड़ाई चली। आखिरकार वे स्वस्थ होकर लौटे, लेकिन बीमारी ने उनके शरीर के बाएं हिस्से को हमेशा के लिए प्रभावित कर दिया। चलने-फिरने में दिक्कत आज भी है, मगर काम के प्रति उनकी प्रतिबद्धता कभी नहीं डगमगाई। मेडिकल बोर्ड ने भी स्पष्ट किया कि वे मानसिक रूप से पूरी तरह फिट हैं और फील्ड ड्यूटी को छोड़कर अन्य सभी प्रशासनिक और तकनीकी जिम्मेदारियां निभाने में सक्षम हैं। यही भरोसा था कि वर्ष 2021 में उन्हें कार्यवाहक डीएसपी की जिम्मेदारी सौंपी गई। आर्मरी शाखा प्रदेशभर की पुलिस यूनिटों के हथियारों की मरम्मत और रखरखाव का अहम केंद्र है। इस संवेदनशील जिम्मेदारी को अनिल विश्वकर्मा वर्षों से निभाते रहे। विभागीय रिकॉर्ड में उनके खिलाफ न कोई प्रतिकूल टिप्पणी है, न कोई सजा और न ही कार्यशैली पर कभी सवाल उठे।
लेकिन जब दस साल बाद डीएसपी पद पर प्रमोशन की सूची जारी हुई, तो उनका नाम उसमें नहीं था। उनसे जूनियर अधिकारियों को प्रमोशन मिल गया, जबकि वे खुद बाहर रह गए। बताया गया कि प्रमोशन के लिए पिछले पांच वर्षों की एसीआर में न्यूनतम 12 अंक जरूरी हैं, जबकि उनके 10 अंक हैं। एक वजह उनकी मेडिकल स्थिति भी बताई जा रही है, जबकि मेडिकल बोर्ड पहले ही उन्हें प्रशासनिक कार्यों के लिए सक्षम घोषित कर चुका है। आज हालात यह हैं कि कभी दूसरों के लिए फैसले लेने वाले अधिकारी अपने ही हक के लिए पुलिस मुख्यालय और गृह विभाग के चक्कर लगा रहे हैं। उन्होंने स्पेशल डीजी (एडमिन) आदर्श कटियार से मिलकर अपनी बात रखी है और विभागीय अपील की तैयारी भी कर रहे हैं। अनिल विश्वकर्मा कहते हैं, मैं नौकरी के दौरान शारीरिक समस्या का शिकार हुआ, लेकिन मेडिकल बोर्ड ने मुझे फिट माना है। फिर भी प्रमोशन से वंचित करना और एसीआर के अंकों का हवाला देकर मेरा हक रोकना न्यायसंगत नहीं लगता। मुझे उम्मीद है कि विभाग मेरी बात सुनेगा। वहीं आईजी एडमिन हरिनारायण चारी मिश्र का कहना है कि, नियम सभी के लिए समान हैं। यदि पात्रता के निर्धारित अंक पूरे नहीं होते तो प्रमोशन संभव नहीं है। यदि आवेदन या अपील आएगी तो नियमानुसार विचार किया जाएगा।
