डीएमएफ खरीदी जांच ने पकड़ी रफ्तार

सिंगरौली । जिला खनिज प्रतिष्ठान से शासकीय महाविद्यालय बरका के लिए स्वीकृत 97.40 लाख रुपये में गड़बड़ी के आरोपों के बीच जांच ने अब रफ्तार पकड़ ली है। शिकायतों के बाद गठित जांच टीम सोमवार को मौके पर पहुंची और पूरे मामले की गहन पड़ताल शुरू कर दी। खास बात यह है कि 40 लाख रुपये की पहली किश्त जारी होने के बावजूद मौके पर संबंधित सामग्री उपलब्ध नहीं मिली, जिससे अनियमितता के आरोप और गहरा गए हैं।

सूत्रों के अनुसार जांच टीम ने कॉलेज परिसर में पहुंचकर करीब दो घंटे तक रिकॉर्ड, स्टॉक रजिस्टर और खरीद प्रक्रिया से जुड़े दस्तावेजों की जांच की। टीम ने बिल-वाउचर, टेंडर प्रक्रिया और आपूर्ति से संबंधित अभिलेखों का मिलान करने की कोशिश की, लेकिन कई जरूरी दस्तावेज मौके पर उपलब्ध नहीं कराए जा सके। इससे यह आशंका मजबूत हो रही है कि फंड के उपयोग में गंभीर लापरवाही या गड़बड़ी हुई है। शिकायत में यह भी आरोप लगाया गया है कि बिना सक्षम प्राधिकारी के आदेश के अग्रणी महाविद्यालय बैढ़न द्वारा खरीद प्रक्रिया संचालित की गई। यदि यह तथ्य जांच में सही पाया जाता है, तो यह वित्तीय नियमों का स्पष्ट उल्लंघन माना जाएगा। जांच के दौरान टीम को खेल सामग्री के गायब होने और किताबों की खरीद में गड़बड़ी के संकेत भी मिले हैं, जिससे मामला और संवेदनशील हो गया है।

अब सबकी नजर जांच रिपोर्ट पर टिकी

सूत्रों के अनुसार जिन सामग्रियों की खरीद कागजों में दिखाई गई है, उनका भौतिक सत्यापन नहीं हो सका। इससे यह सवाल उठ रहा है कि आखिर स्वीकृत राशि का उपयोग किस तरह किया गया। जांच टीम ने कई अहम दस्तावेज अपने कब्जे में लेकर आगे की विस्तृत जांच शुरू कर दी है। प्रशासनिक अधिकारियों का कहना है कि जब्त दस्तावेजों का बारीकी से परीक्षण किया जाएगा और आवश्यकतानुसार संबंधित अधिकारियों व कर्मचारियों से पूछतांछ की जाएगी। जांच पूरी होने के बाद ही वास्तविक स्थिति स्पष्ट हो सकेगी। फिलहाल, इस पूरे मामले ने स्थानीय स्तर पर हलचल बढ़ा दी है और डीएमएफ फंड के उपयोग में पारदर्शिता को लेकर सवाल खड़े हो रहे हैं। अब सबकी नजर जांच रिपोर्ट पर टिकी है, जिससे यह साफ हो सकेगा कि यह सिर्फ लापरवाही का मामला है या फिर कोई बड़ा वित्तीय घोटाला।

पूर्व प्राचार्य एमयू सिद्दीकी पर शक गहराया

जांच में सामने आए तथ्यों ने पूर्व प्राचार्य एमयू सिद्दीकी की भूमिका को संदेह के घेरे में ला खड़ा किया है। महाविद्यालय को आहरण-संवितरण का अधिकार होने के बावजूद खरीद प्रक्रिया बाहरी स्तर से कराई गई, जो सीधे तौर पर नियमों पर सवाल उठाती है। जेम के बिड डाक्यूमेंट में रिपोर्टिंग अधिकारी के रूप में गुलाम मोहिउद्दीन का नाम दर्ज होना भी चौंकाने वाला है, जबकि उनकी पदस्थापना संजय गांधी महाविद्यालय में बताई जा रही है। यह विसंगति पूरे प्रकरण को और संदिग्ध बनाती है। दस्तावेजों की अनुपलब्धता और स्पष्ट जवाब न मिलने से आशंका गहराती जा रही है कि कहीं यह पूरा मामला सुनियोजित अनियमितताओं का परिणाम तो नहीं।

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