साक्षी केसरवानी
भोपाल: राजधानी में कैंसर मरीजों के लिए इस्तेमाल होने वाली और सबसे सस्ती और उपयोगी कीमोथेरेपी दवा सिस्प्लाटिन की पिछले 4 महीनों से बाजार में भारी किल्लत बनी हुई है। आलम यह है कि कई बड़े और सरकारी अस्पतालों के दवा काउंटरों से यह दवा पूरी तरह गायब हो चुकी है। इस किल्लत के कारण डॉक्टरों को मजबूरी में मरीजों के लिए महंगी वैकल्पिक दवा कार्बोप्लाटिन लिखनी पड़ रही है. जिससे मरीजों पर इलाज का खर्च भी बढ़ रहा है. कैंसर विशेषज्ञ डॉ योगेश्वर शुक्ला के अनुसार सिस्प्लाटिन दवा कैंसर के मरीजों के लिये कीमो में सबसे उपयुक्त दवा है.
जिसका उपयोग मुख्य रूप से ओवरी (अंडाशय), फेफड़े, कोलोन, पेट और ओरल कैंसर के इलाज में किया जाता है. लेकिन वर्तमान में सिस्प्लाटिन की भारी कमी के कारण डॉक्टर मरीजों को कार्बोप्लाटिन दे रहे हैं। आमतौर पर कार्बोप्लाटिन का उपयोग ब्रेस्ट कैंसर और ओवेरियन कैंसर की कीमोथेरेपी में होता है। हालांकि सिस्प्लाटिन और कार्बोप्लाटिन दोनों ही प्लैटिनम आधारित कीमोथेरेपी हैं. जो ट्यूमर कोशिकाओं के डीएनए को नुकसान पहुंचाकर उन्हें नष्ट करती हैं. लेकिन सिस्प्लाटिन के क्लोरीन अणु आसानी से अलग हो जाते हैं, जिससे यह शरीर में बहुत तेजी से काम करती है. जबकि कार्बोप्लाटिन का जटिल कार्बोक्सिलेट समूह अधिक स्थिर होता है, इसलिए यह धीरे-धीरे काम करता है.
-क्या हैं दवा आपूर्ति का कारण
विशेषज्ञों के द्वारा अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चल रहे युद्ध और तनाव के कारण सिस्प्लाटिन के कच्चे माल की आपूर्ति नहीं हो पा रही है। जिसके कारण साल 2025 में मिलने वाला कच्चा माल करीब 3 हजार 900 प्रति ग्राम से बढ़कर फरवरी 2026 तक करीब 8 हजार प्रति ग्राम पहुंच चुका है. वहीं सिस्प्लाटिन दवा सरकार के राष्ट्रीय औषधि मूल्य निर्धारण प्राधिकरण की मूल्य-सीमा के दायरे में आती है। इसके कारण कंपनियां इसका दाम खुद से नहीं बढ़ा सकतीं। लागत दोगुनी होने और सरकार द्वारा रेट न बढ़ाए जाने के कारण कई बड़ी कंपनियों ने इसका उत्पादन ही कम कर दिया है।
