मिडिल ईस्ट में जारी तनाव के दौरान बीते कुछ समय में देश में जो तेल-गैस का संकट गहराया था, उसके चलते चार साल से स्थिर पेट्रोल-डीजल की कीमतों में भी इजाफा किया गया था।
मिडिल ईस्ट में ईरान पर अमेरिकी हमले के बाद ग्लोबल टेंशन चरम पर पहुंच गई है। दोनों देशें के बीच फिर शुरू हुए इस जंग से दुनिया की तेल जरूरतों के 20 प्रतिशत की सप्लाई के लिए जरूरी होर्मुज में भी रुकावट का खतरा बना हुआ है। इसी बीच कच्चे तेल की कीमतों में भी तेज वृद्धि देखने को मिल रही है, जो पूरी दुनिया के लिए एक बड़ी टेंशन है। बुधवार के दिन अमेरिका ने ईरान के 90 ठीकानों पर भारी हमले किए। अमेरिकी हमले में ईरान के दो महत्वपूर्ण ब्रिज को उड़ाने की खबर सामने आ रही है।
फरवरी महीने से ईरान-इजरायल और अमेरिका के बीच जारी युद्ध का असर पहले ही पूरी दुनिया झेल चुकी है। हालांकि, अमेरिका और ईरान के बीच हुए समझौते के बाद होर्मुज में आवाजाही सामान्य होने से राहत की उम्मीद की जा रही थी। लेकिन, इस हालिया हमले ने एक बार फिर पूरी दुनिया के सामने कई संकट लाकर खड़े कर दिए हैं।अगर, मीडिल ईस्ट का यह युद्ध शांत नहीं होता है, पूरी दुनिया महंगाई की चपेट में आ सकती है। भारत पर भी इसका खास असर देखने को मिलेगा। आइए 5 प्वाइंट्स में समझते हैं।
तेल-गैस की सप्लाई पर ज्यादा असर
पिछले कुछ महीनों से अमेरिकी और ईरान के बीच जारी संघर्ष की वजह से होर्मुज स्ट्रेट में स्थिति खराब होने के कारण भारत में तेल-गैस का संकट देखा गया। इस दौरान भारत ने भले ही अपने आयात को दूसरे देशों से भी पूरा किया, इसके बावजूद भी देश की ऑयल और गैस जरूरतों की आपूर्ति के लिए होर्मुज अहम है। युद्ध से पहले होर्मुज के रास्ते भारत के कुल कच्चे तेल आयात का करीब 40 प्रतिशत और LNG का करीब 60 प्रतिशत आता था। लेकिन जब युद्ध के बीच यह बंद हुआ तो भारत में करीब 4 साल बाद पेट्रोल-डीजल और एलपीजी की कीमतों में तेज उछाल देखी गई। अगर फिर से US-Iran War के चलते होर्मुज में रुकावट आती है, तो परेशानी देखने को मिल सकती है।
भारत का इंपोर्ट बिल बढ़ने का खतरा
अमेरिका और ईरान के बीच फिर युद्ध शुरू होने से भारत के लिए एक और समस्या पैदा कर सकती है कि देश का इंपोर्ट बिल में इजाफा हो सकता है। भारत अपनी जरूरतों को लभगभ 85 प्रतिशत क्रूड ऑयल इंपोर्ट करता है। तेल आयात की निर्भरता क्रूड की अंतरराष्ट्रीय कीमतों में उतार-चढ़ाव की सीधा असर देश पर डालती है। अगर होर्मुज में आवाजाही प्रभावित होती है, तो कच्चे तेल के की कीमतों में तेज उछाल आएगा। तेल की कीमते बढ़ने से भारत का आयात बिल बढ़ेगा और चालू घाटा बढ़ने से रुपया पर दबाव दिख सकता है, जो अर्थव्यवस्था के लिए ठीक नहीं।
सस्ते पेट्रोल-डीजल की उम्मीदों को झटका
मिडिल ईस्ट में जारी तनाव के दौरान बीते कुछ समय में देश में जो तेल-गैस का संकट गहराया था, उसके चलते चार साल से स्थिर पेट्रोल-डीजल की कीमतों में भी इजाफा किया गया था। एक के बाद एक चार बार में फ्यूल प्राइस में करीब 7 रुपये प्रति लीटर की बढ़ोतरी की गई थी और इसके पीछे मिडिल ईस्ट टेंशन और सप्लाई में रुकावट के चलते सरकारी तेल कंपनियों को होने वाले भारी नुकसान का हवाला दिया गया था। इसके साथ एलपीजी सिलेंडर की कीमतों में बढ़ोतरी का झटका भी लगा था।
इसके बाद अमेरिका-ईरान सीजफायर और क्रूड सस्ता होने से उम्मीद बढ़ी थी कि आने वाले दिनों ईंधन सस्ता हो सकता है, लेकिन अब कच्चे तेल की कीमतों में बढ़ोतरी और होर्मुज टेंशन के चलते ये उम्मीद कम हो गई है।
भारत में तेजी से बढ़ सकती है महंगाई
अमेरिका-ईरान युद्ध का अगला बुरा प्रभाव यह होगा कि भारत में महंगाई बढ़ सकती है, जो कि सीधा क्रूड ऑयल की कीमतों से जुड़ा हुआ है। गौरतलब है कि भारत तेल का सबसे बड़ा आयातक देशों में से एक है। भारत में आयात होने वाले तेल का एक बड़ा हिस्सा होर्मुच से होकर आता है।
अगर युद्ध का खतरा ज्यादा बढ़ने की बीच यह यह बंद होता है तो तेल की कीमतों में ज्यादा उछाल आने के कारण भारत को तेल आयात के लिए अधिक डॉलर देना होगा। इंपोर्ट बिल बढ़ने का प्रेशर रुपये पर दिखेगा, जो आयातित सामानों को महंगा करेगा, जो कि महंगाई बढ़ने जिससे महंगाई की मार बढ़ने का खतरा ज्यादा हो जाएगा।
घरेलू शेयर बाजार पर होगा असर
अमेरिका और ईरान के बीच जारी युद्ध का असर भारतीय शेयर बाजार भी देखने को मिल रही है। बुधवार के कारोबारी सत्रों के दौरान सेंसेक्स में करीब 2000 अंकों तक की गिरावट रिकॉर्ड की गई। जब अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान को लेकर बड़ा बयान देते सीजफायर को खत्म करने की घोषणा कर दीं। ट्रंप के इस ऐलान से घरेलू शेयर बाजार में तबाही आ गई और देखते ही देखते मार्केट पूरी तरह से क्रैश हो गया। यह साफ संकेत है कि अगर अमेरिका-ईरान युद्ध लंबे समय तक चला तो निवेशकों को भी परेशानी होगी।
