
जबलपुर। हाईकोर्ट ने अपने अहम आदेश में कहा है कि जन्मतिथि संतोषजनक नहीं है तो सिर्फ डीएनए रिपोर्ट के आधार पर आरोपी को दोषी मानते हुए सजा से दंडित नहीं किया जा सकता है। जस्टिस विवेक अग्रवाल तथा जस्टिस ए के सिंह अपने आदेश में कहा है कि एलकेजी में दाखिला लेने के बाद कोई 9 साल में कक्षा दसवीं कैसे उत्तीर्ण कर सकता है। आम तौर पर कक्षा दसवीं की परीक्षा में बैठने से पहले एक छात्र को लगभग बारह साल की औपचारिक स्कूली शिक्षा पूरी करना होती है। युगलपीठ ने कक्षा दसवी की मार्कषीट में दर्ज जन्मतिथि को सही नही मानते हुए पास्को सहित अन्य धाराओं के तहत दी गयी सजा को निरस्त करते हुए अपीलकर्ता को दोषमुक्त करने के आदेश जारी किये है।
सिंगरौली निवासी मुन्ना राम की तरफ से दायर अपील में पास्को सहित अन्य धाराओं के तहत जिला न्यायालय द्वारा अधिकतम 20 साल की सजा से दंडित किये जाने को चुनौती दी गयी थी। अपील में कहा गया था कि पीड़ित ने अपने बयान में कहा है कि पिता उसके साथ मारपीट करते थे। जिसके कारण उनसे अपीलकर्ता को बुलाया और बनारस चले गये। बनारस जाकर दोनों ने शादी की और पति-पत्नी की तरह रहने लगे। पीड़िता के अनुसार जब उसने कक्षा पहली में दाखिला लिया था तो उसकी उम्र 7 साल थी। जिला न्यायालय ने कक्षा दसवीं की मार्कशीट में दर्ज जन्मतिथि के आधार पर पीडिता को नाबालिग मानते हुए उसे सजा से दंडित किया है।
युगलपीठ ने सुनवाई के दौरान पाया कि पीड़ित के पिता का कहना है कि उसका विवाह 19 साल पूर्व हुआ था। विवाह के एक साल बाद पीडित पैदा हुई थी। उसने पीड़ित को जुलाई 2014 में एलकेजी कक्षा में दाखिला दिलाया था। पीड़ित की मां का कहना है कि उसका विवाह 20 साल पूर्व हुआ था। पीड़ित का जन्म विवाह के दो साल बाद हुआ था। दसवीं की मार्कशीट में पीड़ित की जन्मतिथि 27 फरवरी 2007 दर्ज है। युगलपीठ ने अपने आदेश में कहा है कि पीडिता के माॅ-पिता के द्वारा दिये गये वयान में उनके विवाह के संबंध में विरोधाभास है। मेडिकर रिपोर्ट में भी पीडित के शरीर पर कोई बाहरी या अंदरूनी चोट नहीं पाई गई। इसके अलावा पीड़िता की प्राइवेसी के उल्लंघन के बारे में कोई निश्चित राय नहीं दी गई। अपीलकर्ता के साथ जाने में पीड़िता अपनी मर्जी से शामिल थी। अभियोजन पक्ष उसकी जन्म तिथि को संतोषजनक ढंग से साबित नहीं कर पाया है। पीड़िता अपनी मर्जी से संबंध बनाने वाली बालिग थी और डीएनए रिपोर्ट पॉजिटिव होने के कारण अपीलकर्ता को दोषी ठहराना सही नहीं है। युगलपीठ ने उक्त आदेश के साथ जिला न्यायालय द्वारा दी गयी सजा को निरस्त करते हुए अपीलकर्ता को दोषमुक्त कर दिया।
