सतना :गंभीर कुपोषण के लिए कुख्यात हो चुके जिले के चित्रकूट क्षेत्र में एक और हैरान कर देने वाली जानकारी सामने आई जब एक गर्भवती महिला के शरीर में महज 1.5 ग्राम हीमोग्लोबिन शेष मिला. मेडिकल ऑफिसर द्वारा लिखे गए पत्र के जरिए यह जानकारी जैसे ही सामने आई वैसे ही जिम्मेदारों के बीच हडक़ंप मच गया. लिहाजा आनन-फानन में समझाइस देते हुए महिला को जानकीकुण्ड स्थित निजी अस्पताल में भर्ती कराया गया.प्राप्त जानकारी के अनुसार जिले के चित्रकूट क्षेत्र में पदस्थ मेडिकल ऑफिसर धर्मेंद्र पाण्डेय द्वारा मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी सतना डॉ. मनोज शुक्ला और ब्लॉक मेडिकल ऑफिसर मझगवां रुपेश सोनी को बुधवार को एक पत्र लिखा गया था. उक्त पत्र ममें इस बात की जानकारी दी गई थी कि चित्रकूट के वार्ड क्र. 6 में एक गर्भवती महिला रहती है.
महिला 6 माह की गर्भवती है, लेकिन वह इस कदर गंभीर एनीमिक है कि उसके शरीर में महज 1.5 ग्रमा रक्त की मात्रा ही बची है. यदि उसे तत्काल उपचार उपलब्ध न कराया गया तो न सिर्फ गर्भवती महिला बल्कि गर्भस्थ शिशु के स्वास्थ्य पर भी गंभीर संकट खड़ा हो सकता है. यह जानकारी सामने आते ही स्वास्थ्य विभाग सहित प्रशासन के बीच खलबली मच गई. लिहाजा आनन-फानन में बीएमओ मझगवां द्वारा एक स्वास्थ्य टीम को उक्त गर्भवती महिला के घर भेजा गया. स्वास्थ्य टीम ने परिजनों से अपील की कि गर्भवती महिला को बिना देरी किए अस्पताल में उपचार के लिए भर्ती करा दिया जाए.
लेकिन परिजनों ने महिला को अस्पताल ममें भर्ती कराने से साफ इंकार कर दिया. मामले की गंभीरता को देखते हुए एसडीएम मझगवां महिपाल गुर्जर और बीएमओ मझगवां डॉ. रुपेश सोनी मातहत अमले के साथ एक बार फिर से चित्रकूट के वार्ड क्र. 6 में स्थित उक्त महिला के घर पहुंच गए. काफी देर तक चली समझाइस और मान-मनौव्वल के बाद परिजन किसी तरह राजी हो गए. नतीजतन महिला को फौरन ही सद्गुरु चिकित्सालय जानकीकुण्ड ले जाया गया. जहां पर उसे भर्ती करते हुए रक्त चढ़ाने की प्रक्रिया शुरु कर दी गई.
नहीं सुधरी कार्यशैली
जिले के चित्रकूट क्षेत्र में गंभीर कुपोषण के कई मामले सामने आने और कुछ बच्चों की मृत्यु हो जाने के बाद प्रशासन द्वारा भले ही व्यवस्था में कसावट लाने का प्रयास किया गया हो. लेकिन इसके बावजूद भी मैदानी अमले की कार्यशैली में कितना सुधार हुआ है. इसकी तस्दीक मेडिकल ऑफिसर द्वारा लिखे गए पत्र के जरिए आसानी से की जा सकती है. मैदानी अमले द्वारा उपस्थिति पंजी में हस्ताक्षर नहीं किए जाते. प्रति शनिवार स्वास्थ्य मिशन कार्यक्रम की बैठक होनी चाहिए, जो कि नहीं होती.
एक ओर जहां फील्ड विजिट रजिस्टर में प्रतिदिन की रिपोर्ट नहीं लगाई जाती है. वहीं दूसरी ओर उनकी उपस्थिति की सत्यापन तक नहीं कराया जाता है. जिसके चलते कुपोषण और एनीमिया जैसी गंभीर बीमारियों की रिपोर्टिंग प्रभावित हो रही है. मामले का काबिलेगौर पहलू यह भी कि स्थानीय स्तर पर स्वास्थ्य के जिस मुखिया पर समूची जिम्मेदारी है, उन्हीं पर मुख्यालय छोडक़र अपनी निजी पै्रक्टिस पर ध्यान केंद्रित करने के आरोप पिछले काफी समय से लगते आ रहे हैं
