खंडवा: जिले के गुड़ी रेंज के आमाखुजरी टांडा में उस समय अफरातफरी मच गई जब अतिक्रमण मुक्त कराई गई जमीन पर दोबारा कब्जा करने पहुंचे बाहरी लोगों ने वन विभाग की टीम पर हमलावर रुख अपना लिया। सरकारी जमीन पर अवैध तरीके से बनाई गई झोपडिय़ों को हटाने पहुंचे वन अमले को करीब 30 से 40 महिलाओं ने चारों तरफ से घेर लिया और न केवल उनके साथ अभद्र गाली-गलौज की, बल्कि उन्हें जान से मारने की धमकी देकर वहां से खदेड़ दिया।
मामले की गंभीरता को देखते हुए गुड़ी रेंज सहित आसपास की रेंजों के वन अधिकारियों ने पीपलोद थाने पहुंच कर धूम सिंह, रमेश, मोवा, सरदार, इंदर सिंह और उनके परिवारों की महिलाओं सहित कई अन्य लोगों के खिलाफ शासकीय कार्य में बाधा डालने और जानलेवा धमकी देने का शिकायती आवेदन दिया है। फिलहाल पुलिस इस शिकायती आवेदन के आधार पर मामले की जांच कर रही है।
क्या रक्षकों की ‘मौन स्वीकृति’ से लुट रहे हैं जंगल?
खंडवा के जंगलों में जिस तरह बाहरी जिलों के लोग आकर बस्तियां बसा रहे हैं और बेखौफ होकर कुल्हाडिय़ां चला रहे हैं, वह वन विभाग के खुफिया तंत्र की विफलता की कहानी बयां कर रहा है। असल सवाल यह है कि जब गुड़ी रेंज के हरे-भरे पेड़ों की बलि चढ़ाई जा रही थी और खेती के लिए ‘नवाड़’ तैयार हो रहे थे, तब क्षेत्रीय बीट गार्ड और रेंजर क्या चैन की नींद सो रहे थे? यह मानना नामुमकिन है कि इतनी बड़ी हलचल की भनक स्थानीय अमले को न हो। ऐसे में विभाग की ‘सुस्ती’ अब भ्रष्टाचार और मिलीभगत की गंभीर बू दे रही है।
थाने में महज एक शिकायती आवेदन देना अब एक घिसी-पिटी कानूनी रस्म अदायगी बन चुका है, जिससे अतिक्रमणकारियों के हौसले और बुलंद हो रहे हैं। अगर शुरुआत में ही सख्ती दिखाई जाती, तो आज महिलाओं को ढाल बनाकर सरकारी तंत्र की साख को सरेआम नीलाम नहीं किया जाता। अब वक्त केवल माफिया पर कार्रवाई का नहीं, बल्कि उन ‘जिम्मेदारों’ पर गाज गिराने का है जिनकी आंखों के सामने जंगल मैदान में तब्दील हो गए।
