कंगाली की दहलीज पर पाकिस्तान, पिछले 6 सालों में 7% बढ़ी गरीबी, दक्षिण एशिया में सबसे बदतर हालात, हर तीसरा नागरिक दाने-दाने को मोहताज

इस्लामाबाद | पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था अपने सबसे काले दौर से गुजर रही है, जहाँ विकास की जगह सैन्य जुनून और गलत नीतियों ने आम जनता की कमर तोड़ दी है। संघीय योजना मंत्री अहसान इकबाल द्वारा जारी ताजा रिपोर्ट के अनुसार, साल 2024-25 में पाकिस्तान की 28.8 प्रतिशत आबादी गरीबी रेखा के नीचे चली गई है। यह आंकड़ा 2018-19 में 21.9 प्रतिशत था, जो पिछले छह वर्षों में लगभग 7% की भयानक वृद्धि दर्शाता है। आज पाकिस्तान का हर तीसरा व्यक्ति बुनियादी जरूरतों के लिए संघर्ष कर रहा है, क्योंकि बेतहाशा महंगाई ने लोगों की खरीदने की शक्ति को पूरी तरह खत्म कर दिया है।

दक्षिण एशिया के अन्य देशों की तुलना में पाकिस्तान की स्थिति बेहद चिंताजनक है। जहाँ भारत ने पिछले एक दशक में 171 मिलियन लोगों को गरीबी से बाहर निकालकर वैश्विक मिसाल पेश की है और बांग्लादेश ने अपने गारमेंट उद्योग के दम पर लाखों का जीवन स्तर सुधारा है, वहीं पाकिस्तान कर्ज के बोझ और आईएमएफ की कड़ी शर्तों में उलझा हुआ है। विशेषज्ञों का मानना है कि पाकिस्तान ने हमेशा अपनी नीतियां अवाम के विकास के बजाय युद्ध और सैन्य खर्चों को केंद्र में रखकर बनाई हैं, जिसके कारण शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार जैसे बुनियादी क्षेत्र पूरी तरह ध्वस्त हो चुके हैं।

पाकिस्तान में गरीबी मापने का पैमाना मासिक खपत पर आधारित है, जिसके तहत 3,758 पाकिस्तानी रुपये से कम खर्च करने वाले को गरीब माना जाता है। आज की महंगाई में इस राशि में दो वक्त की रोटी जुटाना भी नामुमकिन है। पंजाब, सिंध और खैबर पख्तूनख्वा जैसे प्रांतों में हालात सबसे ज्यादा खराब हैं। आर्थिक विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि यदि राजनीतिक अस्थिरता और अंतरराष्ट्रीय निवेश में कमी बनी रही, तो आने वाले समय में रोजगार के अवसर और भी कम हो जाएंगे। पाकिस्तान को कंगाली के इस गहरे दलदल से निकलने के लिए अपनी प्राथमिकताओं में क्रांतिकारी बदलाव करने होंगे।

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