नई दिल्ली | भारतीय मुद्रा पर महात्मा गांधी की तस्वीर को लेकर अक्सर बहस छिड़ती है, लेकिन इसके डिजाइन में बदलाव करना कोई सरल प्रक्रिया नहीं है। भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) अधिनियम, 1934 की धारा 25 के अनुसार, नोटों के डिजाइन, स्वरूप और सामग्री में किसी भी बदलाव के लिए आरबीआई के केंद्रीय बोर्ड की सिफारिश और केंद्र सरकार की अंतिम मंजूरी अनिवार्य है। हालांकि धारा 22 के तहत नोट जारी करने का एकाधिकार केवल आरबीआई के पास है, लेकिन ‘बापू’ की जगह किसी अन्य महापुरुष या प्रतीक की तस्वीर लगाने का फैसला पूरी तरह से राजनीतिक और संवैधानिक सहमति पर निर्भर करता है।
यदि भविष्य में नोटों के डिजाइन को बदलने का विचार आता है, तो इसके लिए एक लंबी प्रक्रिया का पालन करना होता है। सबसे पहले आरबीआई का केंद्रीय बोर्ड सुरक्षा मानकों, जालसाजी रोकने की क्षमता और छपाई लागत जैसे तकनीकी पहलुओं का अध्ययन करता है। इसके बाद एक विशेषज्ञ समिति का गठन किया जाता है, जो जनता की भावनाओं और राष्ट्रीय एकता को ध्यान में रखते हुए नए प्रतीकों का सुझाव देती है। इन सिफारिशों को वित्त मंत्रालय को भेजा जाता है, और कैबिनेट की मंजूरी के बाद ही छपाई की नई सीरीज शुरू की जा सकती है। 1996 में महात्मा गांधी सीरीज को इसी सुरक्षा और वैश्विक पहचान के उद्देश्य से लागू किया गया था।
समय-समय पर रवींद्रनाथ टैगोर या एपीजे अब्दुल कलाम जैसी हस्तियों की तस्वीर नोटों पर लगाने की अटकलें लगती रही हैं, लेकिन रिजर्व बैंक ने हमेशा इन दावों का खंडन किया है। जून 2022 में भी आरबीआई ने आधिकारिक तौर पर स्पष्ट किया था कि वर्तमान में महात्मा गांधी की तस्वीर बदलने का कोई प्रस्ताव विचाराधीन नहीं है। विशेषज्ञों का मानना है कि गांधी जी की तस्वीर भारतीय मुद्रा की एक वैश्विक और सांस्कृतिक पहचान बन चुकी है। तकनीकी रूप से बदलाव संभव होने के बावजूद, राष्ट्रपिता की छवि को हटाना फिलहाल सरकार या रिजर्व बैंक की प्राथमिकताओं और नीतियों का हिस्सा नहीं है।

