थाईलैंड में डबल फैसला: नई संसद के साथ संविधान पर भी जनमत, सियासी भविष्य दांव पर

बैंकाक: थाईलैंड में रविवार को होने वाला आम मतदान सिर्फ नई संसद चुनने की प्रक्रिया नहीं, बल्कि देश की राजनीतिक दिशा तय करने वाला “डबल फैसला” बन गया है। मतदाता एक ओर संसद के निचले सदन के 500 सदस्यों का चुनाव करेंगे, वहीं दूसरी ओर 2017 के मौजूदा संविधान को बदलने या बरकरार रखने पर भी अपनी राय देंगे। ऐसे में यह चुनाव सरकार गठन से आगे बढ़कर शासन व्यवस्था और लोकतांत्रिक ढांचे की पुनर्परिभाषा का अवसर माना जा रहा है।

प्रधानमंत्री अनुतिन चार्नविराकुल द्वारा दिसंबर में संसद भंग करने की मांग के बाद राजनीतिक सरगर्मियां तेज हो गई थीं। संवैधानिक प्रावधानों के तहत आदेश लागू होने के 45 दिन से पहले और 60 दिन के बाद चुनाव नहीं कराए जा सकते थे, इसलिए चुनावी कार्यक्रम समयसीमा के भीतर तय किया गया। इस पूरी प्रक्रिया ने देश में संवैधानिक नियमों और राजनीतिक स्थिरता पर भी बहस को जन्म दिया है।
इन चुनावों का एक अहम पहलू प्रधानमंत्री के चयन की प्रक्रिया भी है। नई संसद बनने के बाद प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार को साधारण बहुमत यानी कम से कम 251 सांसदों का समर्थन हासिल करना होगा। यही कारण है कि छोटे दलों और गठबंधनों की भूमिका भी निर्णायक हो सकती है, क्योंकि वे बहुमत के आंकड़े को पार कराने में किंगमेकर बन सकते हैं।सियासी मुकाबले की बात करें तो मुख्य विपक्षी फ्यू थाई पार्टी, सत्ताधारी भुमजैथाई पार्टी और उभरती हुई पीपुल्स पार्टी के बीच त्रिकोणीय टक्कर की उम्मीद जताई जा रही है।

विपक्ष जहां आर्थिक सुधार, युवाओं के लिए रोजगार और लोकतांत्रिक संस्थाओं की मजबूती को मुद्दा बना रहा है, वहीं सत्ताधारी दल स्थिरता, विकास परियोजनाओं और प्रशासनिक निरंतरता को अपनी ताकत के रूप में पेश कर रहा है।इस चुनाव का दूसरा और शायद अधिक दूरगामी असर संविधान पर जनमत संग्रह से जुड़ा है। मतदाताओं से पूछा जा रहा है कि क्या 2017 के संविधान में बदलाव होना चाहिए या नहीं। कई बड़ी राजनीतिक पार्टियां इस संविधान को पुराना और समय के अनुरूप नहीं बताते हुए बदलाव की वकालत कर रही हैं।

यदि जनता बदलाव के पक्ष में मतदान करती है तो थाईलैंड में संवैधानिक सुधारों की नई प्रक्रिया शुरू हो सकती है, जो सत्ता संतुलन, अधिकारों के वितरण और संस्थागत ढांचे को प्रभावित करेगी।विशेषज्ञों का मानना है कि यह चुनाव केवल सरकार बदलने का नहीं, बल्कि राजनीतिक संस्कृति और संवैधानिक सोच में बदलाव का संकेत भी हो सकता है। युवा मतदाताओं की बढ़ती भागीदारी और सोशल मीडिया पर तेज बहस ने इसे पारंपरिक चुनाव से अलग बना दिया है। कुल मिलाकर, थाईलैंड का यह मतदान देश के राजनीतिक भविष्य, शासन प्रणाली और लोकतांत्रिक दिशा तीनों पर एक साथ मुहर लगाने जैसा माना जा रहा है।

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