दक्षिण भारत में कमल खिलाने का प्रयास

दिल्ली डायरी

प्रवेश कुमार मिश्र

दक्षिण भारतीय राज्यों में अपने राजनीतिक पैर पसारने की फिराक में जुटी भाजपा एक सोची-समझी रणनीति के तहत आगे बढ़ रही है. चर्चा है कि आम बजट में केरल व तमिलनाडु से जुड़े स्थानीय समस्याओं को ठीक करने के उद्देश्य से किए गए विशेष प्रावधान के माध्यम से जहां एक तरफ केन्द्र सरकार आम मतदाताओं के जनहितकारी विषयों के सहारे संदेश देने का प्रयास कर रही है वहीं दूसरी ओर भाजपा अपने सांगठनिक प्रयास से स्थानीय मुद्दों के साथ अपने को जोड़ने के साथ-साथ क्षेत्रीय समस्याओं को उठाकर वैकल्पिक राजनीति पेश करने में जुटी हुई है. चर्चा है कि पार्टी के नवनिर्वाचित अध्यक्ष नितिन नबीन ने केरल व तमिलनाडु की राजनीति को लेकर पार्टी रणनीतिकारों के साथ एक अहम बैठक कर ठोस रणनीति पर विचार-विमर्श किया है.

 

गले की हड्डी बना यूजीसी का नया प्रावधान

 

विश्वविद्यालय अनुदान आयोग द्वारा प्रमोशन ऑफ इक्विटी इन हायर एजुकेशन इंस्टीट्यूशंन रेग्युलेशंस 2026 पर सर्वोच्च न्यायालय द्वारा रोक के बाद भी राजनीतिक दलों द्वारा किसी भी पक्ष के संदर्भ में औपचारिक बयान नहीं दिया जा रहा है. दिल्ली के राजनीतिक गलियारों में इस मुद्दे पर गजब की खामोशी दिख रही है. वोटबैंक की राजनीति के कारण चाहे सत्ताधारी दल का नेता हो या विपक्षी दलों के नेता-प्रवक्ता कोई भी न तो पक्ष में बोल रहा है और न विपक्ष में बोलने को तैयार है. हालांकि अनौपचारिक चर्चा में सभी दलों के नेता इस प्रावधान की कमियों को उजागर करते हुए तरह तरह का तर्क दे रहे हैं. यानी यह विषय गले की हड्डी बन गया है.

 

एक बार फिर बिखर गया पवार परिवार

 

महाराष्ट्र की राजनीति में खासा दबदबा रखने वाले पवार परिवार की एकजुटता और एनसीपी के दोनों गुटों का विलय एक बार अधर में लटक गया है. महाराष्ट्र के उपमुख्यमंत्री अजित पवार के असामयिक निधन के कारण न सिर्फ एनसीपी की संभावित एकजुटता पर ग्रहण लग गया है बल्कि कथित जल्दबाजी में अजित पवार की पत्नी सुनेत्रा पवार द्वारा उपमुख्यमंत्री बनने के निर्णय ने पवार परिवार की एकजुटता की संभावना को लगभग समाप्त कर दिया है. दिल्ली में भी इस विषय को लेकर खूब चर्चा हो रही है. राजनीतिक गलियारों में कहा जा रहा है कि भाजपाई रणनीतिकारों ने शरद पवार के प्रयास पर एक झटके में पानी फेर दिया है.

 

असम व पश्चिम बंगाल की राजनीति को साधने का प्रयास

 

भाजपाई व कांग्रेसी रणनीतिकारों द्वारा असम व पश्चिम बंगाल की राजनीति को साधने के लिए रणनीति बनाई जा रही है. जहां एक तरफ भाजपाई रणनीतिकारों द्वारा असम की राजनीति में उत्पन्न अंतर्कलह को सुलझाने के साथ-साथ सत्ता बचाने के लिए गुटबाजी से परे ठोस रणनीति बनाने का प्रयास किया जा रहा है वहीं दूसरी ओर कांग्रेसी रणनीतिकारों द्वारा असम में छोटे दलों के साथ गठबंधन और पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी से हाथ मिलाकर वोटों के बिखराव को रोकने का प्रयास किया जा रहा है. चर्चा है कि असम के पूर्व मुख्यमंत्री सर्बानंद सोनोवाल व मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा के समर्थकों के आरंभ हुई गुटबाजी से पार्टी हाईकमान चिंतित है संभवतः इसी वजह से बार बार एकजुटता का संदेश दिया जा रहा है. जबकि पश्चिम बंगाल में कांग्रेस पार्टी के वरिष्ठ नेता अधीर रंजन चौधरी के विरोध के बावजूद पार्टी का एक बड़ा पक्ष टीएमसी के साथ समझौता का विकल्प तलाश रहा है. इतना ही नहीं वाम दलों के नेताओं के साथ भी वैकल्पिक गठबंधन करने के लिए बातचीत जारी है.

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