अरावली: विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन जरूरी

अरावली पर्वत श्रृंखला केवल एक भौगोलिक इकाई नहीं, बल्कि उत्तर भारत की पारिस्थितिकी का आधार स्तंभ है. यह श्रृंखला थार के रेगिस्तान को हरियाणा, दिल्ली और पश्चिमी उत्तर प्रदेश की ओर बढऩे से रोकती है, भूजल भंडारण को पोषित करती है और प्रदूषण नियंत्रण में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है. ऐसे में सुप्रीम कोर्ट के नवंबर 2025 के फैसले के बाद शुरू हुआ विवाद मात्र कानूनी परिभाषाओं का नहीं, बल्कि आने वाली पीढिय़ों की पर्यावरणीय सुरक्षा का प्रश्न बन गया है.

कोर्ट ने विशेषज्ञ समिति की सिफारिशों के आधार पर अरावली की एक नई वैज्ञानिक परिभाषा स्वीकृत की है, जिसके अनुसार अब केवल वे संरचनाएं ‘अरावली’ मानी जाएंगी जिनकी ऊंचाई स्थानीय भू-स्तर से 100 मीटर या उससे अधिक है. पर्यावरणविदों का तर्क है कि अरावली का लगभग 90 प्रतिशत क्षेत्र ऐसी छोटी पहाडिय़ों और टीलों से बना है जो इस नए मानक से बाहर हो जाएंगे. स्वाभाविक है कि आशंका बढ़ती है कि क्या यह परिवर्तन उन क्षेत्रों को खनन और रियल एस्टेट गतिविधियों के लिए खुला मैदान बना देगा, जो अब तक कानूनी सुरक्षा के दायरे में थे ?

दूसरी ओर, राज्य सरकारों,विशेषकर राजस्थान,का तर्क आर्थिक है. उनका कहना है कि पूर्ववत विस्तृत परिभाषा के चलते खनन गतिविधियों का बड़ा हिस्सा प्रतिबंधित हो गया था, जिससे रोजगार और राजस्व दोनों पर प्रभाव पड़ा. खनन उन क्षेत्रों में आजीविका का बड़ा स्रोत है, इसलिए उसके पूरी तरह रुकने से सामाजिक-आर्थिक असंतुलन उत्पन्न हो सकता है. अदालत ने इसी संतुलन को ध्यान में रखते हुए मौजूदा कानूनी खनन को जारी रखने की अनुमति दी है, जबकि नए पट्टों पर रोक लगाकर एक सतत खनन प्रबंधन योजना तैयार करने का निर्देश दिया है. फिर भी, सवाल कायम है कि क्या 100 मीटर का पैमाना अरावली जैसी प्राचीन, क्षयग्रस्त पर्वत श्रृंखला को परिभाषित करने के लिए वैज्ञानिक रूप से उपयुक्त है ? कई विशेषज्ञों का मानना है कि अरावली का भू-आकृतिक इतिहास अन्य पर्वत श्रृंखलाओं से भिन्न है. लाखों वर्षों के क्षरण ने इसकी ऊंचाइयों को छोटा किया है, पर इसका पारिस्थितिक महत्व कम नहीं हुआ. छोटी पहाडिय़ां भी भूजल रिचार्ज, जैव-विविधता और प्राकृतिक अवरोध के रूप में उतनी ही उपयोगी हैं जितनी ऊंची संरचनाएं.

आज उत्तर भारत जिस प्रदूषण, जल संकट और मरुस्थलीकरण के खतरे से जूझ रहा है, उसमें अरावली की भूमिका और अधिक निर्णायक हो जाती है. यदि यह प्राकृतिक दीवार कमजोर हुई, तो धूल भरी आंधियां और रेत के विस्तार का दबाव एनसीआर तक महसूस किया जाएगा. भूजल स्तर पहले ही संकट में है,ऐसे समय में पहाड़ी संरचनाओं का और क्षरण किसी बड़े पारिस्थितिक संकट को जन्म दे सकता है. केंद्र सरकार का ‘अरावली ग्रीन वॉल प्रोजेक्ट’ निश्चित रूप से स्वागतयोग्य पहल है. वृक्षारोपण, हरित आवरण और बफर जोन जैसे उपाय पारिस्थितिकी को सांस देते हैं. परंतु इस परियोजना के साथ-साथ यह भी सुनिश्चित करना होगा कि कानूनी सुरक्षा ढांचा कमजोर न पड़े. हर नीति का मूल उद्देश्य यही होना चाहिए कि विकास के साथ पर्यावरणीय संतुलन भी अक्षुण्ण रहे.

यह सही समय है जब नीति-निर्माता, वैज्ञानिक समुदाय, स्थानीय समाज और न्यायालय—सभी एक साझा समझ विकसित करें. अरावली को केवल ऊंचाई के मानकों में नहीं, बल्कि उसके पर्यावरणीय योगदान के आधार पर देखा जाए. खनन के आर्थिक हितों को अस्वीकार नहीं किया जा सकता, पर इन्हें प्रकृति के दीर्घकालिक नुकसान से बड़ा नहीं ठहराया जा सकता.

अरावली हमारे समय की परीक्षा है कि क्या हम अल्पकालिक लाभों के लिए अपनी प्राकृतिक ढाल को कमजोर होने देंगे, या उसे आने वाली पीढिय़ों के लिए सुरक्षित रखेंगे ? इसका उत्तर हमें आज ही तय करना होगा.

 

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