भोपाल। कभी घुटनों पर चलकर स्कूल जाती थी वही आज प्रशासन की ऊंची कुर्सी पर बैठकर सैकड़ों लोगों का मार्ग रोशन कर रही है।
मध्यप्रदेश लोक सेवा आयोग में असिस्टेंट डायरेक्टर के पद पर कार्यरत अंकिता गोस्वामी से बातचीत के दौरान यह साफ महसूस हुआ कि उनकी पूरी जीवन यात्रा संघर्ष दृढ़ता और खुद पर विश्वास का प्रतीक है। शारीरिक रूप से कमजोर बच्चों के भविष्य को लेकर चिंतित रहने वाले अभिभावकों के लिए प्रेरणा बनकर उभरती अंकिता गोस्वामी से बात चीत के अंश।
घुटनों के बल जाती थी स्कूल
जन्म के बाद ही जब पोलियो का पता चला तभी से जीवन की पहली परीक्षा शुरू हो गई थी। चलने में असमर्थ थी इस कारण स्कूल तक हाथों और घुटनों के बल पहुंचती थीं, लेकिन मन में पढ़ने और आगे बढ़ने का हौसला था। इसी हौसले के दम पर दसवीं में जिला प्रावीण्य सूची में स्थान पाया और जीवन का रुख बदलना शुरू हुआ। इसके बाद किशोरावस्था में दोनों पैरों के ऑपरेशन हुए लंबा इलाज चला और महीनों बिस्तर पर रहना पड़ा। सुविधाएं कम थीं दर्द ज्यादा था. फिर भी पढ़ाई से कभी रिश्ता नहीं तोड़ा।
विकलांगता कमजोरी नहीं ताकत बनी
मैंने कॉलेज की हर सीढ़ी हर क्लास और हर प्रयोगशाला तक घुटनों के सहारे पहुंचकर एक युद्ध जीतते हुए आगे बढ़ने की कोशिश की। इंजीनियरिंग करके गेट परीक्षा उत्तीर्ण की और एमएएनआइटी भोपाल में उच्च अध्ययन के लिए चयनित हुईं। आगे ऊर्जा विभाग में उपयंत्री के पद पर नौकरी मिली लेकिन मन में एक ही लक्ष्य था मध्य प्रदेश लोक सेवा आयोग की परीक्षा पास कर प्रशासनिक सेवा में कार्य करना। उस समय व्हीलचेयर की जरूरत थी पर साधन उपलब्ध नहीं थे, फिर भी रुकने से बेहतर आत्मनिर्भर बनना सीखा। मेहनत के रंग में लंबे समय बाद मध्य प्रदेश लोक सेवा आयोग में असिस्टेंट डायरेक्टर के पद जब चयन हुआ तो लगा कि हौसला हो तो हर ऊंची उड़ान उड़ी जा सकती है, इसमें विकलांगता मेरी कमजोरी नहीं बल्कि मेरा साहस बनी, जिससे मुझे हमेशा आगे बढ़ने की प्रेरणा मिली।
