भारत के लिए अरब – इस्लामी नाटो के मायने ?

दोहा में हाल ही में संपन्न अरब-इस्लामी सम्मेलन ने पश्चिम एशिया की राजनीति को नई दिशा देने वाले कई सवाल खड़े कर दिए हैं. इजरायल के हमले के बाद कतर की अगुवाई में जुटे नेताओं ने पहली बार इतनी खुलकर नाटो जैसी सुरक्षा छतरी की जरूरत पर बल दिया. फिलिस्तीन का सवाल, इजरायल की बढ़ती सैन्य ताकत और अमेरिका का स्पष्ट झुकाव—इन सबने इस विचार को बल दिया कि अरब और इस्लामी राष्ट्र यदि संगठित नहीं हुए, तो भविष्य में उनकी स्थिति और कमजोर होगी.

नाटो का उदाहरण इस सोच की प्रेरणा है. दरअसल, शीतयुद्ध के दौर में पश्चिमी देशों ने अपनी सामूहिक सुरक्षा के लिए यह सैन्य संगठन खड़ा किया था. आज वही ढाल अमेरिका और यूरोप को आश्वस्त करती है. प्रश्न यह है कि क्या अरब देश भी इजरायल और उसके पश्चिमी सहयोगियों के विरुद्ध वैसी ही साझा दीवार बना पाएंगे ?

इतिहास गवाह है कि अरब-इजरायल संघर्ष केवल सीमाओं का विवाद नहीं, बल्कि पहचान, धर्म और सत्ता का टकराव भी है. 1948 से लेकर योम किप्पुर युद्ध तक अरब देशों ने कई मोर्चों पर इजरायल का सामना किया, किंतु हार झेलनी पड़ी. इसके बाद धीरे-धीरे यह धारणा बनी कि अकेले किसी देश के बूते यह चुनौती असंभव है. यही सोच दोहा सम्मेलन में “इस्लामी नाटो” की चर्चा का आधार बनी.इजरायल की तकनीकी और सैन्य बढ़त असंदिग्ध है. आयरन डोम जैसे मिसाइल डिफेंस सिस्टम, साइबर युद्ध क्षमता और अमेरिका का अडिग समर्थन उसे क्षेत्र की सबसे प्रभावशाली शक्ति बनाता है. इसके बरअक्स अरब देश आंतरिक मतभेदों, अधिनायकवादी शासन और परस्पर अविश्वास से ग्रस्त हैं. सऊदी अरब और ईरान जैसे क्षेत्रीय दिग्गज एक-दूसरे पर भरोसा नहीं करते. कई देशों ने अब्राहम समझौते के तहत इजरायल से संबंध भी सामान्य किए हैं. ऐसे में साझा मोर्चे की कल्पना आकर्षक जरूर है, पर वास्तविकता से दूर दिखती है.फिर भी, इस सोच के निहितार्थ गहरे हैं. यह संकेत है कि फिलिस्तीन का सवाल आज भी अरब चेतना के केंद्र में है. गाजा की त्रासदी और इजरायल की आक्रामक रणनीति ने मुस्लिम जनमानस में गुस्सा भडक़ाया है. पाकिस्तान जैसे परमाणु संपन्न देश की भागीदारी इस चर्चा को और गंभीर बनाती है. यदि भविष्य में वाकई कोई सामूहिक सैन्य संगठन बनता है, तो यह मध्य-पूर्व की शक्ति-संतुलन की तस्वीर बदल देगा.भारत के लिए यह परिदृश्य विशेष महत्व रखता है. भारत की ऊर्जा आवश्यकताओं का बड़ा हिस्सा खाड़ी देशों से पूरा होता है. वहां भारतीय प्रवासी मजदूरों की संख्या करोड़ों में है. भारत के लिए स्थिर और सुरक्षित पश्चिम एशिया प्राथमिक रणनीतिक लक्ष्य है. किसी भी प्रकार का अरब-इजरायल टकराव भारत को सीधे प्रभावित करेगा.भारत की विदेश नीति संतुलन पर आधारित रही है. एक ओर इजरायल भारत का भरोसेमंद रक्षा और तकनीकी साझेदार है, तो दूसरी ओर अरब राष्ट्रों के साथ भारत के ऐतिहासिक और आर्थिक रिश्ते गहरे हैं. यदि इस्लामी ‘नाटो’ जैसी पहल आगे बढ़ती है, तो भारत को अत्यधिक सावधानी से कूटनीति साधनी होगी. नई दिल्ली को न तो इजरायल को खोना है और न ही अरब देशों का विश्वास. यही संतुलन भारत की वास्तविक सामरिक ताकत है. कुल मिलाकर दोहा सम्मेलन की चर्चा चाहे ठोस संगठन में बदल पाए या नहीं, यह स्पष्ट है कि मध्य पूर्व का भू-राजनीतिक तनाव एक नए मोड़ पर है. अरब देशों की असुरक्षा और इजरायल की आक्रामकता ने मिलकर एक अस्थिर समीकरण खड़ा कर दिया है. भारत के लिए यह समय है कि वह ऊर्जा, प्रवासी और सुरक्षा—तीनों मोर्चों पर अपनी रणनीति और अधिक मजबूत करे. पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव के बीच भारत की भूमिका केवल दर्शक की नहीं, बल्कि सक्रिय मध्यस्थ की हो सकती है.

 

 

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