डॉ रवि तिवारी
रीवा : जिले की जीवन रेखा कही जाने वाली बिछिया नदी बहुत बुरे दौर से गुजर रही है. आधी नदी के सूख जाने से लोगों ने उसे खेत बना डाला है जबकि बचे खुचे हिस्से पर जलकुम्भी ने कब्जा कर रखा है. 12 महीने बहने वाली बिछिया नदी पानी के कमी के चलते दिसम्बर-जनवरी में ही सूख जाती है. रीवा किला के पास बिछिया और बीहर नदी का संगम होता है. उसके बाद बीहर के रूप में नदी का सफर आगे बढ़ता है. बिछिया और बीहर नदी रीवा शहर के लिये ऐतिहासिक और सांस्कृतिक रूप से महत्वपूर्ण है, शहर इन दो नदियो के किनारे बसा हुआ है. नदियो के संरक्षण एवं संवर्धन के लिये भले ही कई सरकारी अभियान चलाए गए हो या चल रहे हो.
लेकिन बिछिया-बीहर नदी आज भी अपनी दुर्दशा को बया कर रही है.बिछिया नदी का उद्गम स्थल मऊगंज जिले के खैरा कनकेसरा गाँव में है. जहा बिछिया एक झिर्री के रूप में अपना सफर शुरू करती है. 40 किलो मीटर का सफर तय कर बिछिया रीवा शहर पहुंचती है और उसके बाद बीहर के रूप में आगे बहती है. विन्ध्य और कैमूर पहाडिय़ों की गोद में बसे मध्य प्रदेश के रीवा की जीवन रेखा है बिछिया नदी. शहर को बीच से बिल्कुल किसी बिच्छू की तरह काटती. लेकिन देश की अधिकांश छोटी बड़ी नदियों की तरह बिछिया की हालत भी खराब है.
नालो का पानी मिलता है नदी में, जलकुंभी ने किया कब्जा
रीवा शहर में बिछिया नदी की स्थिति बहुत निराश करने वाली है. शहर के नालों का पानी तमाम जगह से इक_ा होकर नदी में गिरता है. बिछिया के पानी का अनुपचारित उपयोग बड़ी बीमारियों को न्यौता दे सकता है. तमाम कचरे, शहर के नालों और अन्य रासायनिक पदार्थों के इसमें मिलने की वजह से नदी के पानी में ऑक्सीजन का स्तर खतरनाक रूप से कम हो चुका है. यह नदी कई स्थानों पर जलीय जीवों के जिन्दा रहने के लायक भी नहीं है क्योंकि पानी में उनके साँस लेने के लिये भी ऑक्सीजन नहीं रह गई है. वहीं रही सही कसर नदी में पनपे जलकुम्भी के जंगल ने पूरी कर दी है. लक्ष्मणबाग के पीछे से लेकर किले तक जलकुंभी ने नदी को पूरी तरह से ढक़ दिया है.
पानी सूखने पर खेत बन गई नदी
अपने उद्गम स्थल से निकलने के बाद करीब एक किलोमीटर आगे आकर बिछिया एक ठीकठाक नाले के आकार में परिवर्तित हो जाती है. आगे बढऩे के बाद जहा नदी सूखती है वहा लोगो ने खेत बना दिया है. बरसात के अलावा किसी मौसम में नदी में पानी नहीं रहता है इसलिये नदी के तटवर्ती इलाकों के मालिक किसानों ने लालच के मारे नदी की तलहटी को ही खेत बना दिया. जहाँ पानी की फसल झूमनी चाहिए थी वहाँ कटे हुए गेंहू का भूसा दिखाई देता है. बिछिया अपने अगले पड़ाव गुढ़ मुख्यालय में पहुंचती है जहा पहाड़ो से रिस कर पानी पहुंचता है और गर्मियो में भी यहा पानी नही सूखता है.
कई जगह नदी में पानी बना रहता है. लक्ष्मणबाग से आगे जहाँ तक नजर जाती है बिछिया नदी पूरी तरह जलकुम्भी में डूबी हुई है.जलकुंभी निकालने शुरू हुआ था अभियानपांच वर्ष पूर्व जन अभियान परिषद ने जन सहयोग से निर्मल बिछिया अभियान शुरू किया था. लेकिन कोई खास सफलता इसमे नही मिली और बिछिया नदी साफ नही हो पाई.तिल-तिल कर बिछिया मर रही है. अभियान शुरू होने के बाद सभी लोग आगे आए थे. जिसमें तत्कालीन पुलिस अधीक्षक सहित 150 से अधिक पुलिस के जवान नदी की सफाई में पहुंचे थे. स्थानीय जनप्रतिनिधि और समाजसेवियो ने भी नदी को साफ करने में सहयोग दिया. नदी से हजारो टन कचरा निकाला गया, जिसमें जलकुंभी भी शामिल थी. लेकिन उसके बाद नदी को बचाए रखने के लिये कोई प्रयास किसी रूप में शुरू नही किये गये.
नदी को बचाने आगे आना होगा
रीवा जिला जलस्रोतों के मामले में हमेशा सक्षम रहा है लेकिन अब आधुनिकता के साथ आई प्रकृति के प्रति अवमानना की भावना ने मनुष्य के समक्ष नए किस्म की चुनौतियाँ खड़ी करनी शुरू कर दी हैं. लोगों के पास पैसा है और वे बोतलबन्द पानी खरीद ले रहे हैं लेकिन वे यह नहीं सोचते हैं कि पानी फैक्टरी में नहीं बनाया जा सकता है. अगर हम अपनी नदियों और जलस्रोतों को यूँ ही ठिकाने लगाते रहे तो बहुत बड़ी मुश्किल खड़ी हो जाएगी.गर्मी का मौसम शुरू होते ही प्रशासन बोरबेल उत्खनन पर प्रतिबंध लगा देता है. तो क्या हम पानी को बचाकर नदी का संरक्षण कर जलस्त्रोतो को जीवित नही रख सकते है.
इनका कहना है
रीव के जल संसाधनों पर गहन शोध कार्य करने वाले डा0 मुकेश येंगल कहते हैं,प्रकृति हमें सब कुछ निशुल्क देती है. हम उसे बदले में कुछ देते नहीं हैं लेकिन वह जो देती है उसे सहेजने की जिम्मेदारी तो हमारी बनती है. अगर हम यह भी नहीं कर पाये तो हालात ऐसे ही हो जाते हैं. बिछिया-बीहर नदी को निर्मल बनाने के साथ इसे बचाने की जिम्मेदारी हम सबकी है. कुछ समय पहले अभियान चला था जिसमें बिछिया नदी को साफ किया गया था, लेकिन आगे फिर अभियान थम गया
