हरीश दुबे
प्रद्युम्न सिंह ग्वालियर की सियासत के पुराने खिलाड़ी हैं जिनके राजनीतिक खाते में मंदिर आंदोलन के दिग्गज चेहरे पवैया और अपनी पुरानी पार्टी के तेजतर्रार नेता सुनील शर्मा को दो दो बार चुनाव हराने की उपलब्धियां दर्ज हैं। कांच मिल की मजदूर बस्ती में जमीनी स्तर से सियासत शुरू करने वाले प्रद्युम्न को प्रदेश के तीन मुख्यमंत्रियों शिवराज, कमलनाथ और मोहन यादव की कैबिनेट में रहने का मौका मिला है, वे कांग्रेस में रहें या फिर भाजपा में, पिछले तीन दशक से ग्वालियर की राजनीति का स्तंभ बने हुए हैं। बहरहाल, अपने बयानों और कार्यशैली से वे अपने लिए सुर्खियां बनवा ही लेते हैं।
इस बार ऐसा कुछ कह गए कि प्रदेश की राजनीति में हलचल मच गई। प्रदेश की मौजूदा सरकार के किसी मंत्री ने इतना बेलाग पहले कभी नहीं बोला। प्रद्युम्न विकास की दौड़ में ग्वालियर के पिछड़ने से खफा हैं और इसके लिए सिंधिया से विशेष प्रयास करने की दरकार रखते हैं। प्रद्युम्न यहां तक बोल गए कि सिंधिया को आगे आना होगा और वे ग्वालियर के विकास के लिए सिंधिया के दरवाजे पर बैठने के लिए भी तैयार हैं।
इससे पहले भी प्रद्युम्न ने व्यापारी संगठन कैट के कार्यक्रम में नाराजगी जताई थी कि संयुक्त मप्र में कभी ग्वालियर तरक्की के मामले में सबसे आगे था लेकिन आज पिछड़ गया। खास बात यह है कि इन दोनों कार्यक्रमों में जब प्रद्युम्न ग्वालियर के विकास को लेकर ये तीखे बाण छोड़ रहे थे, उस वक्त सिंधिया भी वहां मौजूद थे। तो क्या, प्रद्युम्न सिंह जो कह रहे थे, उससे सिंधिया भी इत्तेफाक रखते हैं। यह सवाल अभी तक अनुत्तरित ही है कि मुरैना की चंबल से उज्जैन की क्षिप्रा तक फैले तत्कालीन मध्यभारत राज्य की राजधानी रह चुके ग्वालियर शहर के पिछड़ेपन का असल जिम्मेदार कौन है जबकि दोनों मुख्य दलों को लंबे समय तक प्रदेश की सत्ता में रहकर ग्वालियर से जुड़ी संभावनाओं को मूर्तरूप देने के खूब मौके मिले हैं।
सिंधिया के कशीदे पढ़कर सांसद से हिसाब चूकता कर रहे
प्रद्युम्न सिंधिया खेमे के धुरंधर हैं, लिहाजा उन्होंने जो कुछ कहा, राजनीति के पंडित उसे महल खेमे की रणनीति मान सकते हैं लेकिन सिंधिया खेमे से वास्ता न रखने वाले और मूल भाजपा से जुड़े एक और कैबिनेट मंत्री ने भी वही लाइन पकड़ ली है, जिस पर प्रद्युम्न सिंह चल रहे हैं। हम बात कर रहे मोहन कैबिनेट के मंत्री नारायण सिंह कुशवाह की जो करीब दो दशक तक मंत्री बने रहने का रिकॉर्ड बना चुके हैं। वे भी ग्वालियर के विकास का वास्ता देते हुए भरी सभा में सिंधिया से सीमारेखा लांघने की गुजारिश कर रहे हैं।
नारायण सिंह यहां तक कह गए कि कि पीएम, सीएम के बाद ग्वालियर का विकास महाराज ही करा सकते हैं। वे भले ही गुना के सांसद हैं लेकिन ग्वालियर पर ध्यान दें। नारायण सिंह के इस बदले सुर के पीछे कुछ और ही किस्सा बताया जा रहा है, दरअसल, नारायण अभी तलक ग्वालियर के कुशवाह समाज के एकछत्र नेता थे लेकिन इसी समाज के भारतसिंह के सांसद बनने के बाद कुशवाह समाज का एक हिस्सा भारतसिंह के पाले में चला गया, सिंधिया और भारत सिंह की दूरियां जाहिर हैं तो क्या सिंधिया के कशीदे पढ़कर नारायण सिंह अपने ही समाज के सांसद से हिसाब चूकता कर रहे हैं।
अधर में लटका समर नाइट मेला
ग्वालियर मेले में हर साल गर्मियों में लगने वाला समर नाइट मेला इस मर्तबा अधर में लटकता दिख रहा है। मेला मई-जून में लगना है लेकिन समर नाइट मेले की अभी तक कोई तैयारी नहीं है। इसकी वजह से उक्त मेला में दुकानें, झूले व स्टाल लगाने के लिए तैयारी किए बैठे दुकानदार असमंजस में हैं। दुकानदार चाहते हैं कि समर नाइट मेले का शिडयूल प्रोग्राम अविलंब घोषित कर दुकानें आवंटित की जाएं ताकि इस 60 दिवसीय समर नाइट मेले की शुरुआत हो सके। पिछली बार मेले में हैंडी क्राफ्ट एंड आर्ट, खादी सहित अन्य फेब्रिक और फर्नीचर की दुकानों के साथ ही एंटरटेनमेंट जोन भी बनाया गया था लेकिन इस बार ऐसा कुछ नजर नहीं आ रहा।