हंगामेदार रहे परिषदीय समेलन में प्रस्तुत सभी प्रस्ताव हुए पारित

सतना :बुधवार को नगर निगम में आयोजित परिषदीय सम्मिलन न सिर्फ खासा हंगामेदार रहा बल्कि मेराथन बैठक साढ़े 5 घंटे तक जारी रही. एक ओर जहां बैठक के हंगामेदार होने का आगाज विधायक सतना ने सदन में बहस करते हुए कर दिया, वहीं दूसरी ओर उनके प्रतिनिधि ने भी बैठक समाप्त होने तक हंगामा करने में कोई कसर नहीं रख छोड़ी. लेकिन इसके बावजूद भी प्रस्तुत सभी प्रस्तावों को परिषद की ओर से हरी झण्डी मिल गई.नगर निगम के कुल 23 प्रस्तावों को सदन के पटल पर रखने के लिए परिषदीय सम्मिलन बुधवार को आयोजित किया गया था. लेकिन इससे पहले कि सदन की कार्रवाई शुरु हो पाती विधायक सतना सिद्धार्थ कुशवाहा वहां पहुंच गए. विधायक ने सीधे तौर पर आरोप जड़ते हुए कहा कि जिस तरह से ननि की कार्यप्रणाली केचल नामकरण तक ही सिमट कर रह गई है.

उसे देखते हुए ननि में जन्म-मृत्यु प्रमाण पत्र की तर्ज पर नामकरण के लिए भी एक अलग काउंटर खोल दिया जाना चाहिए. इसी कड़ी में विधायक द्वारा कई पत्रों को दिखाते हुए यह बताने का प्रयास किया गया कि शहर से जुड़े विकास कार्यों को लेकर उनके द्वारा कब और क्या-क्या प्रयास किए गए हैं. इसके साथ ही विधायक ने यह नसीहत भी दे डाली कि ननि का मुख्य फोकस इस बात पर होना चाहिए कि शहर में अच्छी सडक़ें, स्वच्छ पेयजल और बेहतर सफाई व्यवस्था कैसे सुनिश्चत हो सके. अपनी बात रखने के बाद विधायक सदप से बाहर चले गए. जिसके बाद परिषदीय बैठक शुरु हुई.

बैठक में एक एक करके प्रस्तुत होने वाले प्रस्तावों पर चर्चा के दौरान अनाधिकृत व्यक्तियों का हस्तक्षेप होता देख अध्यक्ष राजेश चतुर्वेदी भडक़ गए और दो टूक चेतावनी दे दी. इइसी कड़ी में निगमायुक्त डॉ. नागार्जुन बी गौड़ा ने भी नियम बताते हुए कहा कि बैठक में कोई हिस्सा ले सकता है. लेकिन चर्चा करने का अधिकार केवल सदन के सदस्यों का है. हलांकि अधिकांश प्रस्ताव विभिन्न वार्डों में सडक़, सामुदायिक भवन, तालाब, पार्क, गेट, चौराहा व अन्य स्थलों के नामकरण से संबंधित रहे. जिसमें कई तरह की आपत्तियां सामने आने के बाद चर्चा करते हुए पास कर दिया गया. इसके अलावा रेऊरा फार्म में आवारा पशुओं के आश्रय स्थल, नमो हरित क्षेत्र विकसित करने व बैठकी शुल्क में 10 प्रतिशत की बढ़ोत्तरी सहित अन्य प्रस्ताव भी पास कर दिए गए.
ट्रेड लाइसेंस की दरों में बढ़ोत्तरी
शहरी सीमा क्षेत्र में स्थित विभन्न प्रकार के व्यावसायिक प्रतिष्ठानों को ननि की ओर से दिए जाने वाले ट्रेड लाइसेंस के एवज में लिए जाने वाले शुक्ल में कई गुना बढ़ोत्तरी के प्रस्ताव को भी पास कर दिया. हलाङ्क्षक कुछ सदस्यों द्वारा इस विरोध किया गया. लेकिन जब निगमायुक्त ने यह जानकारी दी कि शहर में कुल 4600 दुकानें होने के बावजूद भी ट्रेड लाइसेंस केवल 93 लोगों द्वारा ही लिया गया है. लिहाजा आटा-मसाला चक्की और गैराज जैसे प्रतिष्ठानों की दरों को यथावत रखते हुए लॉज, होटल, स्पा, क्लीनिक, नर्सिंग होम, जांच केंद्र, पेट्रोल पंप, गैस गोदाम, सोना-चंादी दुकान, रेडीमेड गारमेंट, हार्डवेयर सहित लगभग दो दर्जन से अधिक प्रकार के प्रतिष्ठानों पर ट्रेड लाइसेंस की फीस में खासी बढ़ोत्तरी कर दी गई.
उपयंत्री पर गिरी गाज
बैठक में वार्ड क्र. 37 की पार्षद श्रीमती प्रवीण सिंह द्वारा यह मुद्दा उठाया गया कि विद्यालय भवन जर्जर होने के कारण बच्चों को सामुदायिक भवन में पढऩा पड़ रहा है. विद्यालय भवन बनाने को लेकर ठोस जवाब देने के बजाए जिम्मेदार अभियंताओं द्वारा टाल-मटोल की जा रही है. जिसे देख निगमायुक्त ने फौरन ही ईई मुकेश चतुर्वेदी से जानकारी मांगी. गोल-मोल जवाब दिए जाने पर जब निगमायुक्त ने सख्ती बरती तो मालुम हुआ कि 15-20 दिन बीतने के बावजूद उपयंत्री ने स्टीमेट ही तैयार नहीं किया है. यह जानकारी सामने आते ही निगमायुक्त ने फौरन ही उपयंत्री दीक्षा तिवारी के निलंबन को लेकर नोटिस जारी करने के निर्देश दे दिए. हलांकि लचर कार्यशैली के चलते स्वास्थ्य अधिकारी भी निगमायुक्त के निशाने पर आ गए थे. लेकिन उसी दौरान बहस की दिशा बदल जाने के कारण वे बच गए.
वोटिंग से हुआ फैसला
पार्षद, एल्डरमैन, ननि के अधिकारी कर्मचारी, सांसद-विधायक प्रतिनिधि सहित अन्य सभी लोगों की नजर बैठक में प्रस्तुत होने वाले प्रस्ताव क्र. 17 पर टिकी हुई थी. जो शहर के धवारी क्षेत्र में स्थित क्रिकेट स्टेडियम को स्व. शंकर प्रसाद ताम्रकार के नाम पर करने से संबंधित था. इसे लेकर बैठक के आरंभ में जहां विधायक द्वारा आपत्ति जता दी गई थी. वहीं उनके प्रतिनिधि बैठक के समाप्त होने तक इसका पुरजोर विरोध करते रहे. इतना ही नहीं बल्कि सत्ताधारी दल के कुछ पार्षद व उनके पतियों द्वारा भी पर्दे के पीछे से इस मामले को हवा देने का प्रयास किया जा रहा था. लेकिन प्रस्ताव के सामने आने पर कांग्रेस पार्षद सीधे तौर पर महापौर का विरोध करने से बचते नजर आने लगे. हंगामा भले ही काफी हुआ लेकिन समूची बहस से ठोस तथ्यों से इतर होती दिखाई देने लगी. हंगामा बढ़ता देख अध्यक्ष द्वारा उप 28 पार्षदों की राय मांगी जिनके पत्र के आधार पर उक्त प्रस्ताव तैयार हुआ था. कई पार्षदों द्वारा समर्थन किए जाने पर बहुमत के आधार पर प्रस्ताव पारित हो गया.

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