
वाराणसी, 27 अक्टूबर (वार्ता) काशी हिंदू विश्वविद्यालय (बीएचयू) के भारत अध्ययन केंद्र में मंगलवार को ‘मुहावरों के माध्यम से भारतीय भावैक्य’ विषय पर तीन दिवसीय राष्ट्रीय कार्यशाला का शुभारंभ हुआ। कार्यशाला में 24 से अधिक भारतीय भाषाओं के 460 से ज्यादा मुहावरों का सत्यापन और तुलनात्मक अध्ययन किया जाएगा।
भारतीय भाषा समिति, नई दिल्ली के प्रायोजन में आयोजित इस कार्यशाला का संयुक्त आयोजन कला संकाय के भाषाविज्ञान विभाग और भारत अध्ययन केंद्र ने किया है। इसका उद्देश्य विभिन्न भारतीय भाषाओं में प्रचलित मुहावरों एवं मुहावरेदार अभिव्यक्तियों के तुलनात्मक अध्ययन के माध्यम से उनमें निहित साझा भावनाओं, सांस्कृतिक अनुभवों और विचारों को समझना है। इसके साथ ही भारतीय भाषाओं के बीच विद्यमान सांस्कृतिक समानताओं और भावगत संबंधों की पहचान की जाएगी।
कार्यशाला के तीन दिवसीय अकादमिक विमर्श के आधार पर एक विशेष शोधग्रंथ (मोनोग्राफ) तैयार किया जाएगा। इसका प्रकाशन भारतीय भाषा समिति द्वारा किया जाएगा। शोधग्रंथ में विभिन्न भारतीय भाषाओं के मुहावरों का भाषाई और सांस्कृतिक विश्लेषण व्यवस्थित रूप में प्रस्तुत किया जाएगा।
कार्यशाला के विशिष्ट अतिथि बीएचयू के कुलपति प्रो. अजित कुमार चतुर्वेदी ने अपने संबोधन में अंतर्विभागीय संवाद और सहयोग के महत्व पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि विश्वविद्यालय की वास्तविक शक्ति उसकी विविधता में निहित है। इसका पूरा लाभ तभी संभव है, जब विभिन्न विभागों और संकायों के बीच स्थापित सीमाओं से आगे बढ़कर परस्पर सहयोग को प्रोत्साहित किया जाए।
उन्होंने सुझाव दिया कि विश्वविद्यालय में आयोजित कार्यक्रमों में अन्य विभागों के शिक्षकों, शोधार्थियों और विद्यार्थियों की सहभागिता भी सुनिश्चित की जानी चाहिए। प्रो. चतुर्वेदी ने कहा कि मुहावरों का अध्ययन केवल साहित्य तक सीमित नहीं है, बल्कि राजनीति, समाज, संस्कृति और कंप्यूटर विज्ञान जैसे विभिन्न विषयों के संदर्भ में भी किया जा सकता है। ऐसे अंतर्विषयी अध्ययन से शोध का दायरा व्यापक होगा और विषयों को समझने की दृष्टि अधिक समृद्ध होगी।
कार्यशाला के मुख्य अतिथि अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के भाषाविज्ञान विभाग के अध्यक्ष एवं लिंग्विस्टिक सोसायटी ऑफ इंडिया के अध्यक्ष प्रो. एम. जे. वारसी ने कहा कि भारत अनेक भाषाओं, बोलियों और सांस्कृतिक अभिव्यक्तियों से समृद्ध सभ्यता है। प्रत्येक भाषा की अपनी विशिष्ट पहचान है, लेकिन भावनात्मक और सांस्कृतिक स्तर पर उनमें गहरी समानताएं भी मौजूद हैं। भारतीय बहुभाषिकता विविधता में एकता और साझा सभ्यतागत विरासत का आधार है।
उन्होंने कहा कि भारतीय भाषाओं के मुहावरों का तुलनात्मक अध्ययन उनके अर्थ, बिंबों और संप्रेषण की समान परंपराओं को समझने का अवसर प्रदान करता है। इन मुहावरों का व्यवस्थित संकलन, दस्तावेजीकरण और प्रकाशन साझा भाषाई एवं सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण की दिशा में महत्वपूर्ण कदम होगा।
राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 का उल्लेख करते हुए प्रो. वारसी ने कहा कि बहुभाषिकता राष्ट्रीय एकता और सांस्कृतिक संरक्षण का महत्वपूर्ण माध्यम है।
मातृभाषा, घरेलू भाषा, स्थानीय भाषा और क्षेत्रीय भाषाओं को प्रोत्साहित करने के लिए निरंतर प्रयास किए जाने चाहिए। उन्होंने पाणिनि की ‘अष्टाध्यायी’ और तमिल की ‘तोल्काप्पियम’ जैसी रचनाओं का उल्लेख करते हुए कहा कि भारतीय भाषाएं केवल संप्रेषण का माध्यम नहीं हैं, बल्कि संस्कृति, संस्कारों, स्मृतियों और बौद्धिक विरासत की संवाहक भी हैं।
