नवभारत टीम भोपाल। नवभारत की पड़ताल में सरकारी कर्मचारियों की रिश्वतखोरी, करोड़ों की संपत्ति और कार्रवाई में देरी से जुड़े मामले सामने आए हैं। लोकायुक्त के आंकड़ों के मुताबिक, जनवरी 2020 से जून 2026 तक 2,155 प्रकरणों की जांच पूरी की गई।
इससे सरकारी तंत्र की जवाबदेही पर सवाल उठा रहे हैं। नवभारत की पड़ताल में सामने आए आंकड़ों के मुताबिक, भ्रष्टाचार के मामलों में जांच और कार्रवाई के बावजूद अभियोजन स्वीकृति लंबित रहने का मुद्दा गंभीर बना हुआ है।
*NCRB के आंकड़ों में मध्य प्रदेश आठवें स्थान पर*
राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) के 2024 के आंकड़ों के मुताबिक, भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत मध्य प्रदेश में 237 मामले दर्ज किए गए। दर्ज मामलों की संख्या के आधार पर प्रदेश देश में आठवें स्थान पर रहा।
लोकायुक्त के आंकड़ों के अनुसार, जनवरी 2020 से 21 जून 2026 तक शिकायत एवं जांच शाखा और तकनीकी शाखा में कुल 2,155 प्रकरणों की जांच पूरी की गई। इसी अवधि में लोकायुक्त की विशेष पुलिस स्थापना ने 1,318 मामलों में विवेचना पूरी की। रिपोर्ट में 307 प्रकरणों में अभियोजन स्वीकृति लंबित होने की जानकारी दी गई है। मंजूरी नहीं मिलने से संबंधित मामलों में अदालत में चालान पेश करने की प्रक्रिया प्रभावित हो रही है।
*करोड़ों की संपत्ति के मामले भी चर्चा में*
इंदौर में पुलिस प्रशिक्षण महाविद्यालय में पदस्थ प्रधान आरक्षक फिरोज खान से जुड़े मामले में लोकायुक्त की विशेष पुलिस स्थापना ने 14 अक्टूबर को इंदौर, देवास और उज्जैन में 15 ठिकानों पर छापेमारी की थी।
नवभारत की रिपोर्ट के मुताबिक, शुरुआती जांच में 33 अचल संपत्तियों, नौ वाहनों और 21 बैंक खातों से जुड़ी जानकारी सामने आई। संपत्तियों का अनुमानित बाजार मूल्य 29 करोड़ 73 लाख रुपये से अधिक बताया गया। वहीं, ज्ञात स्रोतों से आय करीब 1 करोड़ 93 लाख रुपये आंकी गई। संपत्ति के स्रोत और संभावित बेनामी लेनदेन की जांच जारी होने की जानकारी भी दी गई है।
परिवहन विभाग के आरक्षक सौरभ शर्मा से जुड़े मामले में 100 करोड़ रुपये से अधिक की संपत्ति और निवेश की जांच का उल्लेख है। वहीं, उच्च शिक्षा विभाग के ऑडिटर रमेश हिंगोरानी के मामले में करीब 90 करोड़ रुपये की संपत्ति सामने आने की बात रिपोर्ट में कही गई है।
*लोकायुक्त के ट्रैप केस के आंकड़े*
रिपोर्ट में लोकायुक्त की रिश्वतखोरी के मामलों में कार्रवाई का वर्षवार विवरण भी दिया गया है। वर्ष 2025-26 में 222 ट्रैप केस दर्ज किए गए, जबकि अप्रैल से सितंबर 2026 के बीच 125 ट्रैप केस सामने आए।
इन आंकड़ों के बीच यह सवाल भी उठता है कि रिश्वत लेते पकड़े जाने और जांच पूरी होने के बाद मामलों को अदालत तक पहुंचाने की प्रक्रिया कितनी तेजी से आगे बढ़ रही है।
*सजा के बाद भी नौकरी में बने रहने का मुद्दा*
नवभारत की रिपोर्ट के मुताबिक, वर्ष 2002 से फरवरी 2024 के बीच सजा पाने के बावजूद 1,907 अधिकारी-कर्मचारी नौकरी में बने रहे। रिपोर्ट में उल्लेख है कि कुछ मामलों में कर्मचारी अपील और जमानत के बाद सेवा में लौट आते हैं। हालांकि, प्रत्येक मामले में सेवा संबंधी कार्रवाई संबंधित नियमों और कानूनी स्थिति पर निर्भर करती है।
*भ्रष्टाचार पर कार्रवाई और जवाबदेही जरूरी*
नवभरत की पड़ताल सरकारी तंत्र में भ्रष्टाचार के मामलों, संपत्ति की जांच और अभियोजन स्वीकृति में देरी को लेकर सवाल उठाती है। चुनौती केवल छापेमारी और गिरफ्तारी तक सीमित नहीं है। जांच पूरी होने के बाद समयबद्ध कानूनी कार्रवाई और विभागीय जवाबदेही सुनिश्चित करना भी जरूरी है।
सवाल यही है कि भ्रष्टाचार के मामलों में अभियोजन की मंजूरी लंबित क्यों है और दोषी पाए जाने वालों के खिलाफ कार्रवाई समय पर कैसे सुनिश्चित की जाएगी?
