पंजाब में AAP के आंतरिक सर्वे से बढ़ी रणनीतिकारों की चिंता, टिकट काटें तो बगावत और बचाएं तो हार का डर

पंजाब विधानसभा चुनाव के नजदीक आते ही सत्तारूढ़ आम आदमी पार्टी के भीतर एक अलग किस्म की बेचैनी दिख रही है. पार्टी द्वारा कराए गए आंतरिक मूल्यांकन में करीब तीस फीसदी मौजूदा विधायकों का रिपोर्ट कार्ड खराब पाया गया है, जिसके कारण केंद्रीय नेतृत्व पशोपेश में है. जमीनी हकीकत और बगावत के खौफ के बीच फंसे आप के सिपहसालार इस समय एक ऐसे दोराहे पर खड़े हैं जहां एक तरफ कुआं और दूसरी तरफ खाई जैसी स्थिति बनी हुई है. 117 सदस्यों वाली पंजाब विधानसभा में 94 विधायकों वाली सत्ताधारी आप इस समय विपक्ष के चौतरफा हमलों के अलावा आंतरिक उथल-पुथल से परेशान है. सूत्रों की मानें पंजाब के पांच व दिल्ली के दो राज्यसभा सदस्यों द्वारा बगावत कर भाजपा में शामिल होने के बाद मौजूदा विधायकों में से कई विधायक किसी भी परिस्थिति में टिकट कटने पर भाजपा का दामन थामने की तैयारी में हैं.

हालांकि दलबदलू राज्यसभा सदस्यों के प्रति पंजाब की जनता में गहरा रोष है, जिसके कारण भाजपा सीधे तौर पर नाराज विधायकों को खास तवज्जो नहीं दे रही है. बल्कि राज्यसभा सदस्यों द्वारा आप के सांगठनिक कमजोरियों व विधायकों की खामियों को चिन्हित कर चुनाव के ऐन वक्त पर उनकी घेराबंदी करने की रणनीति पर आगे बढ़ रही है. सूत्रों की मानें तो आप के शीर्ष रणनीतिकारों के सामने इस समय सबसे बड़ी चुनौती पार्टी के भीतर उभरा वह असंतोष है, जिसने आंतरिक सर्वे के बाद पार्टी को गंभीर रूप से हिला दिया है. सत्ता विरोधी लहर और जमीन पर विधायकों के प्रति जनता की नाराजगी को देखते हुए आप रणनीतिकार सख्त कदम उठाने को तैयार थे लेकिन इस निर्णय में उन्हें दोतरफा और आत्मघाती नुकसान होने का खतरा दिख रहा है. उन्हें ऐसा लग रहा है कि जैसे ही किसी सिटिंग विधायक का टिकट कटेगा, विपक्षी दलों को यह कहने का मौका मिल जाएगा कि आप ने खुद अपने नेताओं के भ्रष्टाचार और नाकामी को स्वीकार कर लिया है. इतना ही नहीं दूसरा बड़ा खतरा यह है कि टिकट से वंचित हुए ये विधायक चुप बैठने के बजाय निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में मोर्चा खोल देंगे या फिर कांग्रेस और भाजपा जैसे विरोधी दलों में शामिल होकर आप के ही वोट बैंक में सेंध लगा देंगे.

इतना ही नहीं पंजाब की मुख्य विपक्षी पार्टी कांग्रेस ने राज्य के सबसे संवेदनशील मुद्दों यानी नशा और भ्रष्टाचार को अपनी चुनावी मुहिम का मुख्य हथियार बना लिया है. हाल के दिनों में पंजाब में नशा तस्करी और माफिया राज के खिलाफ आवाज उठाने वाले सामाजिक कार्यकर्ताओं की जिस बेरहमी से हत्याएं हुई हैं, उसने भगवंत मान सरकार की कानून-व्यवस्था को पूरी तरह कटघरे में खड़ा कर दिया है. इन घटनाओं के बाद विपक्ष के आक्रामक हमलों के कारण आम आदमी पार्टी की सरकार पूरी तरह बैकफुट पर है. कांग्रेस इस माहौल का फायदा उठाकर खुद को पंजाब के हकों और सुरक्षा के एकमात्र रक्षक के रूप में पेश कर रही है, वहीं भाजपाई रणनीतिकार भी नशा को समाप्त करने वाले नारे को बुलंद कर आप पर हमलावर हैं.
ऐसे में सवाल यह है कि क्या इस गंभीर सत्ता विरोधी लहर और अपनों की कमजोरी से बचने के लिए आप संयोजक अरविंद केजरीवाल व्यावहारिक राजनीति का रास्ता चुनेंगे या कुनबे को बिखरने से बचाने के लिए अपने द्वारा घोषित ईमानदार राजनीति के मूल सिद्धांत से समझौता कर मौजूदा स्थिति को ही स्वीकार करेंगे.

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