सतना: शहर की पहचान रहे ऐतिहासिक विजयादशमी चल समारोह की परंपरा में दो दशकों से लगे विराम पर शहर के प्रबुद्ध जनों, कलाकारों और संस्कृति प्रेमियों को झकझोर रहा है. हाल ही में इस दिशा में उठी आवाज़ों के बीच सब से बड़ा सवाल उभरा है कि आखिर वह भव्यता और जन-समुदाय का वह उल्लास क्यों थम गया है.उल्लेखनीय है कि दशकों पहले शहर में विजयादशमी का पावन पर्व सिर्फ़ पर्व नहीं बल्कि वृहद धार्मिक आयोजन के रूप में मनाया जाता था. जिसमे लाखों की संख्या में लोग शामिल होते थे. वरिष्ठ जनों ने उन दिनों को याद करते हुए बताया कि पूरे बाजार क्षेत्र को सुंदर रंग बिरंगी लड़ियों से सजाया जाता था.
शहर के अंदर सैकड़ों आकर्षक झांकियां निकाली जाती थीं. जब यह झांकिया तय रूट के हिसाब से एक साथ कतार बद्ध होकर निकालतीं थी तो श्रद्धालू घंटों एक ही जगह अलग- अलग स्वरूपों में झाकियों के दर्शन करते थे. शहर की सड़कें, ख़ान- पान की दुकाने, टॉकीज़ खचा – खच भरे रहतें थे लेकिन बीते दो दशकों में शहर की विजयादशमी की यह सांस्कृतिक परंपरा पूरी तरह समाप्त हो चुकी है. जिसका प्रमुख कारण प्रबुद्ध जन उदासीनता या आधुनिकता की अंधी दौड़ के साथ-साथ लोगों में घटती जन-आस्था और सामूहिक सहभागिता की कमी में गिरावट बताया. प्रबुद्ध जनों का मानना है कि शादियों की परंपरा लुप्त होने के पीछे का प्रमुख कारण लोगों में एकजुटता के भाव में कमी आना म, नेतृत्व की ज़िम्मेदारी लेने वालों की कमी और व्यक्तिगत ख्याति प्राप्त करने लोगों में अलग- अलग गुट तैयार होना धार्मिक मान्यताओं के लिए बड़े आघात से कम नहीं है.
रौनक घटने के मुख्य कारण
विजयादशमी समारोह की समाप्त हुई परंपरा को लेकर प्रबुद्ध जनों का मानना है कि पहले की अपेक्षा लोगों में आस्था और समर्पण में कमीआई है लोगों में सामूहिक सहभागिता और अपनत्व और विश्वास में कमी आने के साथ शहरीकरण और भागदौड़ भरी जीवनशैली ने लोगों को अपने मोहल्लों और पारंपरिक मेल-जोल से दूर कर दिया, जिससे आयोजनों में दिखने वाली सामाजिक समरसता कमजोर हुई. नई पीढ़ी का रावण दहन की औपचारिकता तक सीमित रह जाना इस बात का प्रमाण है कि सांस्कृतिक जड़ों से उनका जुड़ाव कमजोर हुआ है. जब भीतर की आस्था और उत्साह कम होता है, तो बड़े आयोजनों के लिए जरूरी जन-बल और ऊर्जा स्वतः कम हो जाती है. एक प्रमुख कारण प्रशासनिक और समितियों के बीच निरंतरता का अभाव भी रहा जिसके कारण शताब्दी पुरानी परंपरा धीरे- धीरे समाप्त हो गई.
कैसे लौटेगा पुराना वैभव.
यदि शहर की इस बिसरी हुई विरासत को पुनः जीवंत करना है, तो केवल प्रशासनिक नहीं बल्कि संगठनात्मक इच्छा शक्ति और सर्व समाज के एक जुट होने से समाज के हर वर्ग को आगे आना होगा.
दृढ़ इच्छा शक्ति से सब संभव: पुष्कर सिंह तोमर
शहर के पूर्व महापौर पुष्कर सिंह तोमर जी ने कहा की पहले की अपेक्षा लोगों में अब देवी आस्था का स्वरूप ही बदल गया है. पहले लोगों में आपसी प्रतिस्पर्धा की होड़ थी लोग प्रथम पुरस्कार पाने सुंदर लाइटिंग के साथ कलात्मक झांकियां तैयार करते थे. इसे पुनः स्थापित करने के लिए त्यौहार की गरिमा को ख़ुद से ऊपर रख कर सर्व समाज, दल, वैचारिक मत भेद को एक तरफ़ कर परंपरा को पुनर्जीवित करने समिति बनाई जानी चाहिए जो राजनीति और चेहरा चमकाने से अलग हमारी धार्मिक परंपरा का सूत्र बन सके और पुनः वही भव्यता और उत्सव का आयोजन सुरु हो सके.
परंपरा को जीवंत करने एक जुट हो समाज: राजाराम
शहर के पूर्व महापौर राजाराम त्रिपाठी जी ने उस दौर को याद करते हुए कहा की खो रही सांस्कृतिक विरासत आने वाली पीढ़ी के लिए चिंता का विषय है इसे जीवंत करने पुनः संगठनात्मक ढांचा बनाये जाने की जरूरत है और यह तभी संभव है जब सर्व समाज एक जुट होकर भक्ति, आस्था और कला के इस पावन पर्व को समर्पित भाव से मनाए.
चेंबर करेगा पूरा सहयोग: सतीश सुखेजा
विंध्य चेम्बर ऑफ़ कॉमर्स एंड इंडस्ट्रीज़ के अध्यक्ष सतीश सुखेजा ने कहा की दशहरे का चल समारोह देखने कई जिलों से लोग आते थे. झांकी देखने वालों से शहर की सड़कें, चौराहे भरे रहते थे शहर आस्था और भक्ति के रस में डूबा रहता था वह दिन आज भी याद आते हैं. समारोह की भव्यता को जीवंत करने के प्रयासों में चेम्बर अग्रणी भूमिका निभायेगा. परम्पराओं को जीवित रखना आवश्यक है इस पर बात होनी चाहिए.
फूहड़ता में तब्दील हुआ उत्सव: विवेक अग्रवाल
पूर्व के उत्सव और आज के उत्सव में बहुत बड़ा गैप देखने को मिला अब लोगों में आस्था कम दिखावा बढ़ा है. भक्तिभाव के पर्व पर फूहड़ता का प्रचलन इन दिनों खूब देखने को मिलता है हमारे त्यौहार हमारी परंपरा हैं इन्हें पुनर्जीवित करने की आवश्यकता है जिसके लिए पुनः प्रयास किया जाना चाहिए ताकि अपने आने वाली पीढ़ियों तक हम अपना भक्ति भाव पुरानी परंपरा और संस्कृति को ज़िंदा रख सकें और फूहड़ता से हट कर अनुशासन और धार्मिकता को बच्चे समझ सकें.
