जबलपुर: एक ओर पुत्र वियोग में महाराज दशरथ के प्राण त्यागने का मार्मिक दृश्य, दूसरी ओर राजसिंहासन सामने होने के बावजूद बड़े भाई श्रीराम के प्रति समर्पण दिखाते भरत। श्री रामलीला समिति गढ़ा जबालीपुरम के सिद्ध मंच पर इन प्रसंगों के मंचन ने श्रद्धालुओं को भावविभोर कर दिया। ‘राम… राम… हा राम!’ की पुकार के साथ दशरथ मरण का दृश्य साकार हुआ तो रामलीला मैदान में मौजूद दर्शक भावुक हो उठे।
लीला में सुमंत्र द्वारा श्रीराम, लक्ष्मण और सीता के वन से वापस नहीं लौटने का समाचार सुनाए जाने पर दशरथ पुत्र वियोग सहन नहीं कर सके। उधर, ननिहाल से लौटे भरत को पिता के निधन और श्रीराम के वनगमन की जानकारी मिली तो उन्होंने अयोध्या का राजसिंहासन स्वीकार करने से इनकार कर दिया। भरत अपनी माताओं, गुरुजनों और अयोध्या की प्रजा के साथ श्रीराम को वापस लाने चित्रकूट पहुंचे। उनके चरित्र के माध्यम से प्रेम, मर्यादा और कर्तव्य को सत्ता एवं राजसुख से ऊपर बताया गया। इसके बाद जयंत और महर्षि अत्रि-अनसूया के प्रसंगों का भी मंचन हुआ।
इनकी रही उपस्थिति
कार्यक्रम का शुभारंभ भगवान श्रीराम की आरती एवं पूजन से हुआ। समिति के संचालक पं. अशोक मनोध्याय, अध्यक्ष एवं निर्देशक राजेश मिश्रा, महामंत्री एडवोकेट अरुण दीक्षित सहित अन्य पदाधिकारियों ने पूजन-अर्चन किया। इस अवसर पर रामलीला परिवार में छह दशक से सेवाएं दे रहे स्थायी सदस्य सीताराम दुबे को शाल, श्रीफल और प्रतीक चिह्न भेंट कर सम्मानित किया गया। राजेंद्र प्यासी, हरीश मनोध्याय, संजय तिवारी, रमाशंकर कटारे, राजेश नेमा, विनायक तिवारी, डॉ. नीना उपाध्याय सहित अनेक रामभक्त उपस्थित रहे। समिति के अनुसार 15 अक्टूबर को शूर्पणखा चरित्र, खर-दूषण वध एवं सीता हरण की लीला का मंचन किया जाएगा।
