13 अक्टूबर 1972 को एंडीज पर्वतमाला में हुए विमान हादसे में 45 लोग सवार थे। जान बचाने के लिए बचे यात्रियों ने 72 दिनों तक भूख, ठंड और मुश्किलों का सामना किया।
क्या कोई अपने ही दोस्तों, परिजनों और जानने वाले लोगों का मांस खा सकता है? यह वह सवाल है जिसने पूरी दुनिया को करीब 54 साल से उलझाए रखा है। एक प्लेन, एक हादसा और जिंदा रहने की जंग। खाने के लिए खाने के लिए अपने ही दोस्तों के शरीर के टुकड़े और पीने के लिए पानी जगह बर्फ और जानलेवा माइनस 40 डिग्री टेंपरेचर का मौसम। हम बात कर रहे हैं उरुग्वे एयरफोर्स फ्लाइट 571 का हादसे की, इस प्लेन में सवार कुछ लोगों ने जिंदा रहने के लिए इंसानी मांस तक खाया। आइए जानते हैं इस दर्दनाक हादसे की पूरी कहानी।
13 अक्टूबर 1972 को उरुग्वे एयरफोर्स फ्लाइट 571 दक्षिण अमेरिका की एंडीज पर्वतमाला में दुर्घटनाग्रस्त हो गई थी। विमान में कुल 45 लोग सवार थे। इनमें ओल्ड क्रिश्चियन क्लब की रग्बी टीम के 19 सदस्य, उनके परिवार के लोग, दोस्त और चालक दल के सदस्य शामिल थे।
जिंदा रहने की जंग और टूटती उम्मीद
हादसा इतनी दुर्गम जगह पर हुआ था कि वहां तक बचाव दल का पहुंचना बेहद मुश्किल था। हादसे के कई दिनों तक अर्जेंटीना के बचाव दल ने विमान को खोजने की कोशिश की, लेकिन सफेद बर्फ से ढके पहाड़ और दुर्गम इलाके के कारण वे नाकाम रहे। दुर्घटना में चालक दल के तीन सदस्यों और नौ अन्य यात्रियों की मौके पर ही मौत हो गई थी। इसके बाद कई लोगों ने गंभीर चोटों और जमा देने वाली ठंड के कारण दम तोड़ दिया।
जो लोग इस हादसे में बच गए थे, उनके सामने सबसे बड़ी चुनौती जिंदा रहने की थी। चारों तरफ बर्फ से ढके पहाड़ थे और खाने का कोई इंतजाम नहीं था। ऐसे में धीरे धीरे उनकी हालत बिगड़ने लगी। आखिरकार भूख से बचने के लिए उन्होंने अपने मृत साथियों के शवों से मांस खाना शुरू कर दिया।
समझौते के बाद मांस खाने पर बनी सहमति
विमान हादसे के बाद बचे लोगों के पास खाने का सीमित सामान था, जो करीब 10 दिनों में खत्म हो गया। इसके बाद विमान में मौजूद मेडिकल की पढ़ाई कर रहे रॉबर्ट कैनेसा ने सुझाव दिया कि बर्फ में दबे मृत साथियों के शरीर से मांस लेकर अपनी जान बचाई जा सकती है। लेकिन उनके सामने सबसे बड़ा सवाल था कि क्या ये करना सही होगा?
कांच के टुकड़ों से काटा शव
एक तरफ जिंदा रहने की जंग थी और दूसरी तरफ अपने ही मृत परिजन। ऐसे में जिंदा बचे लोगों ने एक समझौता किया कि महिलाओं और बच्चों के शवों को कुछ नहीं किया जाएगा। इसके अलावा उन लोगों ने एक दूसरे से वादा किया कि कल को अगर उनकी मौत हो जाती है और बाकी बचे लोग जिंदा रहने के लिए उसका मांस खाते हैं तो वो उन्हें इसके लिए माफ करते हैं।
हालांकि इसके बाद भी मांस काटना और उसे खाना आसान नहीं था। लेकिन बढ़ती भूख और कमजोर होते शरीर ने उन्हें ऐसा करने पर मजबूर कर दिया। उन्होंने कांच के टुकड़ों की मदद से शवों से मांस निकाला और बहुत मुश्किल मन से उसे खाना शुरू किया।
एक जीवित बचे यात्री ने बाद में एक न्यूज चैनल को बताया था कि शुरुआत में इस तरह मांस खाना बेहद घिनौना और असहज लगता था। लेकिन परिस्थितियां ऐसी थीं कि धीरे धीरे उन्हें इसकी आदत पड़ गई। उन्होंने आपस में यह सहमति भी बना ली थी कि अगर उनमें से किसी की मौत हो जाती है, तो बाकी लोग जिंदा रहने के लिए उसके शव का इस्तेमाल कर सकते हैं।
72 दिनों तक बर्फ में जिंदगी की जंग
हादसे के बाद बचे लोगों को कई दिनों तक उम्मीद थी कि बचाव दल उन्हें खोज लेगा। लेकिन समय बीतने के साथ उनका इंतजार लंबा होता गया। चारों ओर बर्फ, जमा देने वाली ठंड और खाने की कमी ने उनकी मुश्किलें बढ़ा दी थीं।
स्थिति तब और गंभीर हो गई, जब उन्हें एहसास होने लगा कि शायद बाहरी दुनिया ने उन्हें मृत मान लिया है। ऐसे में उन्होंने खुद ही मदद तलाशने का फैसला किया। नैंडो पर्राडो और रॉबर्ट कैनेसा ने विमान के मलबे से निकलकर आसपास किसी बस्ती या इंसान की तलाश में जाने की योजना बनाई।
बिना उपकरणों के पड़ाह पर की चढ़ाई
यह सफर आसान नहीं था। कई सप्ताह तक भूखे रहने के कारण दोनों का शरीर कमजोर हो चुका था। इसके बावजूद उन्होंने हिम्मत नहीं हारी। अपने साथ इंसानी मांस के कुछ टुकड़े लेकर दोनों बर्फीले पहाड़ों की ओर निकल पड़े, ताकि यात्रा के दौरान उनके पास खाने के लिए कुछ हो।
दस दिनों की यात्रा के बाद मिली मदद
नैंडो पर्राडो और रॉबर्ट कैनेसा ने करीब दस दिनों तक कठिन परिस्थितियों में सफर किया। इस दौरान उन्हें बर्फीले पहाड़ों और दुर्गम रास्तों से गुजरना पड़ा। आखिरकार उन्हें नदी के दूसरी तरफ एक व्यक्ति दिखाई दिया। दोनों ने चिल्लाकर उसे अपनी स्थिति बताने की कोशिश की, लेकिन दूरी और भाषा की समस्या के कारण वह उनकी बात ठीक से समझ नहीं पाया। बाद में वह व्यक्ति मदद लेकर लौटा और दोनों तक सहायता पहुंचाई गई।
इसके बाद बचाव अभियान शुरू हुआ। 22 दिसंबर 1972 को रेस्क्यू हेलीकॉप्टर दुर्घटनास्थल पर पहुंचा और बचे हुए लोगों को निकालने की प्रक्रिया शुरू हुई। इस हादसे में कुल 16 लोग 72 दिनों तक संघर्ष करने के बाद जीवित बचाए जा सके।
