जयप्रकाश नारायण की जयंती पर राजधानी में पंचायती राज व्यवस्था पर चर्चा

नयी दिल्ली, 11 अक्टूबर (वार्ता) विकसित भारत-2047 के लक्ष्य के लिए देश में पंचायती राज व्यवस्था को मजबूत बनाने को जरूरी बताते हुए राजनीति और सामाजिक क्षेत्र के विशेषज्ञों और सामाजिक संगठनों के प्रतिधियों ने पंचायती राज संस्थानों के काम में सुधार, पंचायतों के प्रतिनिधियों के प्रशिक्षण, उनकी गुणात्मक भागीदारी और जमीन स्तर पर योजनाओं के निर्माण में सामाजिक संगठनों को बड़े स्तर पर जोड़ने की जरूर पर बल दिया है।

लोक नायक जयप्रकाश नारायण (जेपी) की जयंती पर यहां “जमीनी स्तर से लोकतंत्र और विकास: पंचायती राज संस्थाएँ और लोकनायक जयप्रकाश नारायण का दृष्टिकोण – नागरिक समाज संगठनों की भूमिका” विषय पर चर्चा आयोजित चर्चा में यह भी कहा गया है कि महात्मा गांधी और जयप्रकाश जी जैसी हस्तियां – सामाजिक आर्थिक परिवर्तन को जमीनी स्तर तक पहुंचाने में सरकार की सीमाओं को समझते थे, इसीलिए वे आत्म सुधार और सामाजिक भागीदारी को परिवर्तन के केंद्र में रखते थे।

राज्य सभा के उप-सभापति हरिवंश की अध्यक्षता में जेपी की 124वीं जयंती पर इस परिचर्चा का आयोजन पीड़ित उपेक्षित बच्चों के लिए काम करने वाली संस्था प्रयास जेएसी सोसाइटी, इंडिया हैबिटेट सेंटर और एसोसिएशन ऑफ वॉलंटरी एजेंसीज़ फॉर रूरल डेवलपमेंट (अवार्ड) ने संयुक्त रूप से किया था। जेपी ने लम्बे समय तक अवार्ड का नेतृत्व किया था। इस चर्चा में जेपी के ग्राम स्वराज, विकेंद्रीकरण और लोकशक्ति के विचारों पर विचार-विमर्श किया गया। इसमें पंचायती राज संस्थाओं को स्वशासन की प्रभावी इकाइयों के रूप में मजबूत बनाने की आवश्यकता पर जोर दिया गया। परिचर्चा में प्रयास के संस्थापक एवं मार्गदर्शक एवं पूर्व आईपीएस अधिकारी आमोद के. कंठ, जेपी आंदोलन के प्रमुख कार्यकर्ता, पत्रकार और इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कलाकेंद्र के अध्यक्ष रामबहादुर राय , पूर्व केंद्रीय मंत्री और जेपी के सहयोगी सुबोधकांत सहाय, राजनीतिज्ञ दुर्गा प्रसाद सिंह तथा पूर्व केंद्रीय मंत्री संजय निषाद तथा विभिन्न सामाजिक संगठनों के प्रतिनिधियों ने हिस्सा लिया।

श्री हरिवंश ने कहा कि जेपी की विरासत केवल राजनीतिक सुधार तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका संबंध व्यक्ति और समाज में बदलाव लाने से भी है। उन्होंने कहा कि सरकारें अकेले हर सामाजिक समस्या का समाधान नहीं कर सकतीं। इसके लिए नागरिकों की जिम्मेदारी, नैतिक मूल्यों और सामूहिक प्रयासों की भी आवश्यकता है। उन्होंने नैतिक पुनर्जागरण, जिम्मेदार आचरण और नागरिकों की सक्रिय भागीदारी को वास्तविक विकास का आधार बताया।

वक्ताओं ने कहा कि स्वैच्छिक कार्यों और जमीनी स्तर पर लोकतंत्र को बढ़ावा देने में जेपी की भूमिका अवार्ड और अखिल भारतीय पंचायत परिषद के अध्यक्ष के रूप में भी रही, जो ग्रामीण विकास, स्वैच्छिक प्रयासों और विकेंद्रीकृत लोकतंत्र के प्रति उनकी लंबे समय से चली आ रही प्रतिबद्धता को दर्शाती है। चर्चा में संविधान की 11वीं अनुसूची में शामिल 29 विषयों का पूर्ण हस्तांतरण करने और पंचायतों को पर्याप्त अधिकार, धन तथा कर्मचारी उपलब्ध कराने की आवश्यकता पर जोर दिया गया। प्रमुख सुझावों में वर्ष में कम से कम छह बार ग्राम सभा की बैठकें आयोजित करना, जनभागीदारी और सामाजिक अंकेक्षण को मजबूत करना तथा पंचायती राज को समवर्ती सूची में शामिल करने पर विचार करना शामिल रहा। इसके साथ ही न्याय पंचायतों की स्थापना, निर्वाचित प्रतिनिधियों, विशेषकर महिलाओं के लिए व्यवस्थित प्रशिक्षण, विकेंद्रीकृत योजना निर्माण, बैंकिंग और सूक्ष्म वित्त तक बेहतर पहुँच, जवाबदेही को मजबूत करने तथा नागरिक समाज संगठनों और पंचायती राज संस्थाओं के बीच ऐसे सहयोग पर जोर दिया गया, जो निर्वाचित स्थानीय शासन का स्थान लेने के बजाय उसे मजबूत करे।

प्रयास जेएसी सोसाइटी के संस्थापक श्री कंठ ने कहा कि भारत के बच्चों, युवाओं और महिलाओं के सामने आने वाली अधिकांश वंचनाओं की जड़ें ग्रामीण भारत में हैं, जहाँ देश की 65 प्रतिशत आबादी रहती है। उन्होंने कहा कि मजबूत पंचायतों के बिना 2047 तक विकसित भारत का लक्ष्य हासिल नहीं किया जा सकता। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि नागरिक समाज संगठनों को निर्वाचित स्थानीय सरकार के विकल्प के रूप में नहीं, बल्कि उसके सहयोगी के रूप में काम करना चाहिए।

पूर्व केंद्रीय मंत्री श्री सहाय ने पंचायती राज व्यवस्था की व्यापक समीक्षा की आवश्यकता पर जोर देते हुए कहा कि कई राज्यों में अब भी अधिकारों का पूर्ण हस्तांतरण नहीं हुआ है। उन्होंने कहा कि पंचायत सुधार को राष्ट्रीय प्राथमिकता बनाया जाना चाहिए। श्री राय ने चर्चा को जेपी के उस आह्वान से जोड़ा, जिसमें शासन की मौजूदा पिरामिड व्यवस्था को उलटकर ऐसा बनाने की बात कही गई थी, जिसमें गाँवों से जुड़े फैसले वहाँ रहने वाले लोग स्वयं लें।

उन्होंने कहा कि 73वें संविधान संशोधन से पंचायतों को संवैधानिक दर्जा तो मिला, लेकिन वे अब भी अपनी अपेक्षित भूमिका से दूर हैं। उनके पास अधिकार सीमित हैं और कई जगह ग्राम सभाएँ केवल कागजों तक सीमित रह जाती हैं। उन्होंने राजनीतिक इच्छाशक्ति, जनभागीदारी, सामाजिक अंकेक्षण और नागरिक पहलों को मजबूत कर गाँवों तथा आदिवासी समुदायों को सशक्त बनाने की आवश्यकता बताई।

पूर्व सांसद एवं शिक्षाविद् प्रो. संजय पासवान ने पंचायतों में मुखियाओं की अनुपस्थिति की बढ़ती प्रवृत्ति और स्थानीय शासन में प्रभावशाली जातियों के वर्चस्व को लेकर चिंता जताई। अवार्ड के महासचिव दुर्गा प्रसाद सिंह ने सामूहिक प्रयासों के माध्यम से जनभागीदारी बढ़ाने और पंचायती राज संस्थाओं को मजबूत करने के लिए एक साझा मंच विकसित करने पर जोर दिया। उन्होंने जागरूकता बढ़ाने, स्थानीय नेतृत्व को प्रोत्साहित करने और समावेशी ग्रामीण विकास को आगे बढ़ाने में सामुदायिक भागीदारी के महत्व को रेखांकित किया। चर्चा में इस बात को दोहराया गया कि ग्राम स्वराज का जेपी का दृष्टिकोण आज भी सहभागी, जवाबदेह और जन-केंद्रित शासन के लिए प्रासंगिक है। पंचायतों को वास्तविक अधिकार देना, नागरिकों की सक्रिय भागीदारी सुनिश्चित करना और नागरिक समाज के साथ निरंतर सहयोग बढ़ाना समावेशी ग्रामीण विकास तथा विकसित भारत 2047 के लक्ष्य को हासिल करने के लिए आवश्यक है।

 

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