भोपाल। आचार्य श्री समयसागर महाराज ने रत्नकरण्डक श्रावकाचार के स्वाध्याय में कहा कि मोक्ष की प्राप्ति के लिए सम्यक दर्शन, सम्यक ज्ञान और सम्यक चारित्र तीनों आवश्यक हैं। धर्म केवल सुनने या चर्चा का विषय नहीं, बल्कि उसे जीवन में आचरण के रूप में उतारना चाहिए। मीडिया प्रभारी भविष्य जैन ने बताया कि आचार्य श्री ने कहा, मोक्ष अवस्था में जीव अजर और अरोग होता है, जहां वृद्धावस्था और रोग नहीं होते। रोग असाता कर्म के उदय से आते हैं और पूर्व में बंधे कर्म इसका कारण हो सकते हैं। उन्होंने कहा कि पर वस्तु के प्रति आसक्ति और बंधन आत्मकल्याण में बाधक हैं। आश्रव को रोकना ही संवर है। भावों की मलिनता दूर कर अशुभ प्रवृत्तियों को रोकना जरूरी है। उन्होंने साधु-संतों के प्रति बहुमान, ज्ञान के प्रति आदर और आत्मचिंतन पर जोर देते हुए कहा कि धर्म को शब्दों तक सीमित न रखकर व्यवहार में उतारना ही मोक्षमार्ग की दिशा है।
धर्म को केवल सुनें नहीं, जीवन में प्रयोग के रूप में उतारें : आचार्य समयसागर
