सीधी : आरटीआई का काला सच है कि जानकारी देने विभाग गंभीर नही है। जिले के ज्यादातर विभाग जानकारी देने में उदासीन बने हुये हैं। प्रथम अपीलीय आदेश के बाद भी जानकारी नही दी जाती है।दरअसल सूचना का अधिकार अधिनियम आम नागरिकों को सरकारी काम-काज में पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करने का कानूनी अधिकार देता है लेकिन सीधी जिले में आरटीआई आवेदकों को जानकारी हासिल करने के लिये बार-बार कार्यालयों के चक्कर लगाने पड़ रहे हैं। आरोप है कि जिले के कई विभागों में निर्धारित समय-सीमा में जानकारी उपलब्ध नहीं कराई जाती है।
स्थिति यह है कि प्रथम अपीलीय अधिकारी के आदेश के बाद भी कई मामलो में आवेदकों को मांगी गई जानकारी नहीं मिल पा रही है। आरटीआई के माध्यम से सरकारी योजनाओं, विकास कार्यों, निर्माण कार्यों, खर्च की गई राशि, नियुक्तियों, लाभार्थियों और विभागीय निर्णयों से संबंधित जानकारी मांगी जाती है। इसका उद्देश्य सरकारी व्यवस्था को पारदर्शी बनाना और आम नागरिक को यह जानने का अधिकार देना है कि सरकारी धन और योजनाओं का किस प्रकार उपयोग किया जा रहा है। लेकिन जब विभागीय स्तर पर ही सूचना उपलब्ध कराने में टालमटोल की जाती है तो आरटीआई कानून की मूल भावना प्रभावित होती है।
जानकारी नही लेने बनाया जाता है दबाव: नीरज गुप्ता
आरटीआई कार्यकर्ता एवं पूर्व पार्षद नीरज कुमार गुप्ता का कहना है कि जिले के लोक स्वास्थ्य यांत्रिकी विभाग खण्ड सीधी, ग्रामीण यांत्रिकी विभाग, लोक निर्माण विभाग, जिला अस्पताल सीधी, जल निगम, राजस्व एवं अधीक्षक कलेक्टर सहित विभिन्न विभागों में निर्धारित समय में जानकारी नही दी जाती है। यहां तक कि प्रथम अपीलीय आदेश के बाद भी जानकारी देने में विभाग उदासीन बने हुए हैं और विभिन्न माध्यमों से जानकारी नही लेने का दबाव बनाया जाता है।
कलेक्टर द्वारा आरटीआई के समीक्षा की दरकार
आरटीआई की जानकारी देने में उदासीन बने विभागों का यह मानना है कि जानकारी नही देने पर प्रथम अपील के बाद द्वितीय अपील में जाने वाले आवेदक की 2-3 साल तक सुनवाई नही होगी। इसी का लाभ लेकर विभाग जानकारी देने में उदासीन बने हुए हैं। जानकारी नही देने से विभाग की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े हो रहे हैं। आरटीआई के इस काले सच की कलेक्टर द्वारा समीक्षा की दरकार है।
ब्लैकमेलरों से वास्तविक आरटीआई कार्यकर्ता हो रहे बदनाम
आरटीआई के माध्यम से मांगी गई जानकारी का उपयोग लोकहित में होना लाभदायक है। किन्तु यहां यह देखा जा रहा है कि कुछ लोग आरटीआई के माध्यम से वांछनीय जानकारी लेने के बाद विभागीय अमला को ब्लैकमेल करते हैं। ऐसे ब्लैकमेलरों के चलते वास्तविक आरटीआई कार्यकर्ता भी बदनाम हो रहे हैं। आरटीआई का आवेदन लगने के बाद से ही विभागीय अधिकारी इस संशय में पड़ जाते हैं कि जानकारी देने के बाद कहीं ब्लैकमेल होने का खतरा तो नहीं बढ़ जायेगा।
इनका कहना है
सूचना अधिकार अधिनियम की जानकारी देने की एक निश्चित नियमानुसार प्रक्रिया है। यदि निर्धारित समय सीमा में जानकारी नही मिलती है तो प्रथम अपील की जा सकती है। यदि इसके बाद भी कोई समस्या है तो आरटीआई कार्यकर्ता द्वारा उसकी लिखित शिकायत की जाये। जिसकी जांच करा नियमानुसार कार्यवाही की जायेगी।
विकास मिश्रा, कलेक्टर सीधी
