वॉशिंगटन, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने रूस और ईरान पर नकेल कसने वाले एक बेहद कड़े कानून पर आधिकारिक रूप से हस्ताक्षर कर दिए हैं। व्हाइट हाउस द्वारा शुक्रवार को जारी जानकारी के अनुसार, ‘लिंडसे ओ. ग्राहम सैंक्शनिंग रशिया एंड ईरान एक्ट ऑफ 2026’ (H.R. 5334) नामक इस नए कानून का मुख्य उद्देश्य रूस के ऊर्जा क्षेत्र, रक्षा उद्योग और उसके गुप्त बेड़े (‘शैडो फ्लीट’) को आर्थिक रूप से कमजोर करना है। इस अधिनियम के तहत अमेरिकी राष्ट्रपति को यह व्यापक अधिकार मिल गया है कि वे रूस से भारी मात्रा में कच्चा तेल और प्राकृतिक गैस खरीदने वाले देशों, जिनमें भारत और चीन भी शामिल हैं, पर 100 प्रतिशत तक का भारी आयात शुल्क (टैरिफ) लगा सकते हैं।
कानून के दायरे में रूस के शीर्ष पांच ऊर्जा खरीदार देश, राष्ट्रपति ट्रम्प को दिए गए हैं टैरिफ लगाने और छूट तय करने के व्यापक अधिकार
यह नया कानून राष्ट्रपति के हस्ताक्षर के 30 दिनों के भीतर प्रभावी हो जाएगा और इसके प्रावधानों के अनुसार, कानून बनने से पहले के एक साल में रूसी कच्चे तेल या प्राकृतिक गैस के शीर्ष पांच आयातक देशों से आने वाले सामान पर 100 प्रतिशत तक का शुल्क लगाना अनिवार्य किया गया है। हालांकि, इस कानून में कुछ विशिष्ट रियायतें भी दी गई हैं, जिसके तहत यदि कोई देश रूस से गैस का आयात उसके कुल निर्यात के 15 प्रतिशत से कम रखता है और इसे घटाने के लिए गंभीर प्रयास करता है, तो उसे गैस से जुड़े शुल्कों से छूट मिल सकती है। साथ ही, ट्रम्प प्रशासन के पास यह तय करने का भी पूरा अधिकार होगा कि किन देशों पर यह टैरिफ लागू किया जाए और इसकी दरें क्या होंगी।
रूस के ‘शैडो फ्लीट’ और प्रतिबंधों का उल्लंघन करने वालों पर होगी कड़ी कार्रवाई, ईरान पर लगे प्रतिबंधों का दायरा भी बढ़ाया गया
ऊर्जा व्यापार पर नकेल कसने के अलावा यह कानून रूस के गुप्त जहाजी बेड़े (शैडो फ्लीट) और मॉस्को की मदद करने वाले विदेशी संस्थाओं जैसे जहाज मालिकों, ऑपरेटरों, प्रबंधकों और बीमा कंपनियों को भी सीधे तौर पर निशाना बनाता है। इसके साथ ही, इस कानून के जरिए ईरान पर पहले से चले आ रहे अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों की अवधि और उनके दायरे को भी काफी बढ़ा दिया गया है। वैश्विक राजनीति और व्यापार के जानकारों का मानना है कि अमेरिका के इस कड़े कदम से भारत और चीन जैसे बड़े ऊर्जा आयातकों की रणनीतिक व आर्थिक रणनीतियों पर एक बड़ा प्रभाव पड़ सकता है।

