
ग्वालियर। उपभोक्ता जब दुकान से कोई पैक्ड उत्पाद खरीदता है तो वह पैकेट पर लिखी जानकारी और दावों को भरोसे का आधार मानता है। ऐसे में यदि सौ फीसदी, प्राकृतिक या शुद्ध नारियल पानी जैसे दावे उपभोक्ता की धारणा कुछ और बनाएं और उसी पैकेट की सामग्री की जानकारी कुछ और तस्वीर पेश करे, तो मामला सिर्फ प्रचार का नहीं, उपभोक्ता के भरोसे से जुड़े अधिकार का बन जाता है।
नारियल पानी वाले पेय के मामले में एक लीटर में नौ प्रतिशत नारियल पानी का कंसंट्रेट लिखे होने का अर्थ है कि उत्पाद में नारियल पानी से प्राप्त गाढ़े अर्क की मात्रा नौ प्रतिशत है। ऐसे में सवाल उठता है कि आकर्षक दावे और वास्तविक संरचना के बीच उपभोक्ता को पर्याप्त स्पष्ट जानकारी दी जा रही है या नहीं।
खाद्य विभाग की जिम्मेदारी
भ्रामक दावों की पुष्टि करना, उत्पाद के नमूने लेकर उनकी जांच कराना और नियमों का उल्लंघन मिलने पर निर्माता के खिलाफ कार्रवाई करना खाद्य विभाग की जिम्मेदारी है। लेकिन व्यवहार में अक्सर शिकायत सामने आने के बाद ही जांच शुरू होती है। तब तक बड़ी संख्या में उपभोक्ता उत्पाद खरीद चुके होते हैं।
कानून के जानकार बोले, दावा भी जांच के दायरे में
उपभोक्ता मामलों के जानकार अधिवक्ता अनंत दुबे के अनुसार, उपभोक्ता को भ्रमित करने वाला दावा केवल आकर्षक विज्ञापन मानकर नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। यदि पैकेजिंग, विज्ञापन या उत्पाद का प्रस्तुतीकरण वास्तविक सामग्री को लेकर गलत धारणा पैदा करता है तो संबंधित कानूनों के तहत कार्रवाई और उपभोक्ता को राहत का रास्ता खुल सकता है। जरूरत यह है कि जिम्मेदार एजेंसियां स्वतः संज्ञान लेकर जांच करें।
उपभोक्ता का दर्द, पैसे से ज्यादा भरोसा ठगा
एक उपभोक्ता वर्किंग वुमन पवित्रा सिंह ने कहा कि उसने पैकेट पर नारियल पानी से जुड़े दावे देखकर उत्पाद खरीदा था। बाद में सामग्री की जानकारी पढ़ने पर उसे लगा कि जिस चीज को वह शुद्ध नारियल पानी समझ रही थी, वह वैसा नहीं है। उसका कहना था, पैसा तो कुछ रुपये का गया, लेकिन सवाल भरोसे का है।
