ग्वालियर चंबल डायरी
हरीश दुबे
ऐसे वक्त जब विधानसभा चुनाव में ढाई बरस और स्थानीय निकाय चुनाव में बमुश्किल सवा साल का वक्त बाकी है, समूचे ग्वालियर चंबल संभाग में पुलिस महकमे में शीर्ष स्तर पर नई जमावट की गई है, हालांकि फेरबदल के इस दौर में ग्वालियर के पुलिस कप्तान धर्मवीर सिंह अपनी कुर्सी साफ बचा ले गए, ग्वालियर में उन्हें दो बरस से ज्यादा का वक्त हो चुका है। स्थानांतरण किसी भी महकमे में एक विभागीय प्रक्रिया है और इसे भविष्य के चुनावों या किसी राजनीतिक प्रयोजन से जोड़कर देखा जाना जल्दबाजी होगी लेकिन यह भी सच्चाई है कि वरिष्ठ प्रशासनिक पदों पर पदस्थापना में सत्ताधारी दल के स्थानीय छत्रपों की पसंद और नापसंद का भी अहम रोल रहता ही है, मंत्रालय में तबादला सूचियां फाइनल करते वक्त संबंधित जिले के राजनीतिक समीकरण को खास तौर पर ध्यान में रखा जाता है।
ग्वालियर चंबल की दो विधानसभा सीटों दतिया और विजयपुर में विधानसभा उपचुनाव का मसला कोर्ट के भावी निर्णय पर निर्भर है लेकिन सत्तारूढ़ दल अपनी ओर से हरसंभव मुस्तैदी बनाए रखना चाहता है, दतिया में एसपी बदले जाने को इसी संदर्भ में देखा जा रहा है। दतिया में अब तक सूरज वर्मा कप्तानी संभाल रहे थे, उन्हें भिंड भेज दिया गया है और उनकी जगह मयूर खंडेलवाल को लाया गया है। प्रदेश सरकार ने ताजा फेहरिस्त में जिन 62 आईपीएस अधिकारियों की पोस्टिंग में बड़ा फेरबदल किया है, उसमें ग्वालियर-चंबल संभाग ही सबसे ज्यादा प्रभावित हुआ है।
संभाग के कई एसपी और प्रशासनिक अधिकारी बदल दिए गए हैं। लंबे समय से ग्वालियर रेंज में डीआईजी की जिम्मेदारी संभाल रहे अमित सांघी को होमगार्ड में भेजकर उनकी जगह असित यादव को ग्वालियर रेंज का नया डीआईजी बनाया गया है। खास बात यह कि 2011 बैच के आइपीएस असित यादव पिछले दो साल से भिंड में पुलिस अधीक्षक थे। इससे पूर्व वह मुरैना के भी पुलिस कप्तान और ग्वालियर में एसएएफ कमांडेंट रह चुके हैं। खास बात यह कि पुलिस में उनका कैरियर ग्वालियर से ही शुरू हुआ था। प्रक्षिक्षु अवधि में वह ग्वालियर में ही बतौर सीएसपी तैनात रहे थे। फेरबदल में मुरैना और शिवपुरी भी प्रभावित हुए हैं जहां क्रमशः धर्मराज मीना और यांगचेन डोलकर भूटिया को नई कमान सौंपी गई है। कानून व्यवस्था के लिहाज से पिछले कुछ महीने इस अंचल में सुकून से नहीं बीते हैं, जाहिर है कि नए ओहदेदारों के समक्ष चुनौतियां कम नहीं हैं
नए सदर के आते ही साडा में लौट आई रौनक
राजधानी दिल्ली में आबादी और प्रशासनिक दफ्तरों के बढ़ते दवाब को कम करने के लिए ग्वालियर महानगर के पश्चिमी छोर पर नया ग्वालियर बसाने जिन सपनों के साथ विशेष क्षेत्र विकास प्राधिकरण यानि साडा की स्थापना की गई थी, उसमें पिछले छह बरस से चल रहा सूखा अब समाप्त हो गया है। नए सदर अशोक शर्मा ने आज जिस उत्साह और नए संकल्पों के साथ प्राधिकरण की सदारत संभाली, उसे देखते हुए उम्मीद लगाई जा सकती है कि इस प्राधिकरण के दिन बहुरने वाले हैं। अशोक शर्मा अनुभवी राजनेता हैं और करीब ढाई दशक पहले ग्वालियर मेला प्राधिकरण के अध्यक्ष पद को संभालते हुए अपना प्रशासनिक हुनर दिखा चुके हैं।
आर्थिक मंदी के उस दौर में जब सौ साल पुराना ग्वालियर मेला भी हिचकोले खाने लगा था, उस वक्त वे ग्वालियर के उद्योग, वाणिज्य जगत के पर्याय बन चुके इस आयोजन को पटरी पर ले आए थे। उनसे कुछ ऐसी ही उम्मीद नई जिम्मेदारी के निर्वाहन को लेकर लगाई जा रही है। दरअसल, साडा में मकान तो खूब बन गए हैं, लेकिन उनमें रिहायश नहीं हुई, केंद्र सरकार का कोई बड़ा दफ्तर भी यहां ट्रांसफर नहीं हुआ। राजीव गांधी सरकार में आवास और शहरी विकास मंत्री रहे अब्दुल गफूर ने दिल्ली का दवाब कम कम करने जिस एनसीआर का ब्लू प्रिंट तैयार किया था, उसमें ग्वालियर भी शुमार था लेकिन छियासी में उनके मंत्री पद से हटते ही एनसीआर के प्रस्तावित मानचित्र से ग्वालियर भी गायब हो गया।
स्व. शीतला सहाय ने ग्वालियर के समीप बसाए जा रहे काउंटर मैग्नेट नगर को अपना विजन बनाया लेकिन सरकारें बदलते रहने से जीतोड़ कोशिश के बाद भी वे लक्ष्य तक नहीं पहुंच सके। बाद के दौर में जयसिंह कुशवाहा और राकेश जादौन जैसे नेताओं को भी साडा संभालने का मौका मिला, उन्होंने दिल्ली से भोपाल तक प्रयास भी किए लेकिन वे साडा को हाशिए पर जाने से नहीं रोक सके। अब साडा में नया निजाम है। चूंकि ग्वालियर के तीन प्राधिकरणों में से सिर्फ साडा की अध्यक्षी ही सिंधिया खेमे को मिली है, लिहाजा माना जा सकता है कि नए सदर अपने नेता के प्रभाव के इस्तेमाल कर काउंटर मैग्नेट सिटी की बसाहट में आ रही व्यावहारिक अड़चनों को दूर करने एवं नए शहर से जुड़ी अपनी परिकल्पनाओं और संकल्पों को जमीन पर साकार करने के लिए ठोस कदम उठाएंगे। फिलहाल समस्या यह है कि साडा के पास अपना खुद का प्रशासनिक अमला नहीं है। यहां ज्यादातर अधिकारी और कर्मचारी दीगर महकमों से प्रतिनियुक्ति पर लाए गए हैं। स्टाफ की कमी है और स्थापना व्यय कंट्रोल करने के लिए नए पदों की स्वीकृति भी नहीं मिली है। साडा में चेयरमैन पद पर नियुक्ति के साथ यह तो साफ हो गया कि इस निकाय का देर सबेर जीडीए में विलय नहीं होने जा रहा है और यह अपनी पृथक पहचान बनाए रखेगा।
लगता है बड़ा पेंच फंस गया…
ग्वालियर में प्राधिकरण तो आबाद हो गए लेकिन इस अंचल से निगम बोर्डों में नियुक्तियां नहीं हो पा रहीं। जाहिर है कि बड़ा पेंच फंसा है। खादी ग्रामोद्योग बोर्ड के उपाध्यक्ष पद पर राकेश जादौन की नियुक्ति हुई तो ग्वालियर के नेताजी को बधाईयां शुरू हो गईं। ग्वालियर के राकेश को विनम्रता के साथ बताना पड़ा कि ये मैं नहीं बल्कि विदिशा वाले हमारे हमनाम भाई हैं। नरोत्तम मिश्रा अपने निकटवर्ती कौशल शर्मा की नियुक्ति कराने में सफल रहे लेकिन सिंधिया के समर्थक मुन्नालाल गोयल, इमरती देवी, गिर्राज दंडोतिया का इंतजार अभी अधूरा है। खबर यह भी है कि इन्हें अब विधानसभा चुनाव की तैयारी पर ध्यान केंद्रित करने को कहा गया है लेकिन इंतजार चालू आहे…!
