नयी दिल्ली 11 मार्च (वार्ता) ‘चीफ ऑफ इंटीग्रेटेड डिफेंस स्टाफ टू द चीफ्स ऑफ स्टाफ कमेटी’ एयर मार्शल अशुतोष दीक्षित ने बुधवार को कहा कि दक्षिण एशिया में बदलते भू-राजनीतिक परिदृश्य के बीच भारत को क्षेत्रीय व्यवस्था को सक्रिय रूप से आकार देना होगा क्योंकि पड़ोसी देशों की परिस्थितियां देश की राष्ट्रीय सुरक्षा को लगातार प्रभावित कर रही हैं। एयर मार्शल दीक्षित ने यहां संयुक्त युद्ध अध्ययन केंद्र द्वारा “भारत के पड़ोस में बदलती परिस्थितियां” विषय पर आयोजित संगोष्ठी में बोलते हुए कहा कि पड़ोसी देशों में होने वाले घटनाक्रमों का भारत के रणनीतिक माहौल पर सीधा प्रभाव पड़ता है।
उन्होंने कहा, “हमारे सामने मुख्य चुनौती केवल घटनाओं पर जवाबी कार्रवाई करना नहीं है, बल्कि क्षेत्रीय व्यवस्था को सक्रिय रूप से आकार देना है।”
उन्होंने जोर देकर कहा कि भारत के पड़ोस को केवल एक परिधीय क्षेत्र मानने की पारंपरिक धारणा अब पुरानी हो चुकी है। “भारत के पड़ोस को वर्णित करने के लिए एक वाक्यांश इस्तेमाल किया जाता रहा है कि यह भारत का निकट विदेश है। मैं कहना चाहता हूँ कि यह दृष्टिकोण अब उपयोगी नहीं है। पड़ोसी न तो निकट होता है और न दूर, वह हमारे ही जैसा है।”
एयर मार्शल दीक्षित ने कहा, “पड़ोस में होने वाली हर अस्थिरता अंततः भारत के दरवाजे तक पहुंचती है, और इसके विपरीत भारत द्वारा दिया गया हर वास्तविक सहयोग सद्भावना, विश्वास और रणनीतिक अवसर के रूप में वापस आता है।”
हाल ही में बांग्लादेश में हुए राजनीतिक और रणनीतिक घटनाक्रमों का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि दोनों देशों के संबंध अब अधिक अनिश्चित चरण में प्रवेश कर गए हैं।
उन्होंने कहा, ” वर्ष 2024 में शेख हसीना को सत्ता से हटाए जाने और उसके बाद अंतरिम सरकार के दौरान बढ़ी भारत-विरोधी भावना ने भारत-बांग्लादेश संबंधों के उस स्वर्णिम दौर को समाप्त कर दिया, जिसकी हम पहले चर्चा करते थे।” उन्होंने आगाह किया कि ढाका द्वारा आधारभूत संरचना और रक्षा क्षेत्रों में चीन के साथ बढ़ता सहयोग एक रणनीतिक परिवर्तन का संकेत है।
उन्होंने कहा, “ये किसी शत्रु के निर्णय नहीं हैं, लेकिन ये ऐसे पड़ोसी के निर्णय हैं जो अब भारत को अपना स्वाभाविक सुरक्षा साझेदार नहीं मानता।” उन्होंने कहा कि भारत को यथार्थवादी दृष्टिकोण अपनाना चाहिए और संवाद तथा सहयोग के माध्यम से चिंताओं का समाधान करना चाहिए।
एयर मार्शल ने कहा, “हमें बांग्लादेश की संप्रभुता से जुड़ी चिंताओं को परिपक्वता से समझना चाहिए, नई परियोजनाओं पर द्विपक्षीय रूप से काम करना चाहिए और मोंगला जैसे नागरिक बंदरगाहों के बाहरी नौसैनिक शक्तियों के लिए संभावित रसद केंद्र के रूप में उपयोग पर स्पष्ट बातचीत करनी चाहिए।”
नेपाल की स्थिति की चर्चा करते हुए एयर मार्शल दीक्षित ने कहा कि वहां की राजनीतिक अस्थिरता का भारत की उत्तरी सुरक्षा पर प्रभाव पड़ता है।
उन्होंने कहा, “नेपाल की राजनीतिक उथल-पुथल का भारत की उत्तरी सुरक्षा रणनीति पर सीधा प्रभाव पड़ता है।” उन्होंने कहा कि काठमांडू द्वारा आर्थिक संबंधों को विविध बनाने और भारत पर निर्भरता कम करने के प्रयासों के प्रति संतुलित प्रतिक्रिया की आवश्यकता है।
एयर मार्शल ने कहा, “हमें घबराहट में नहीं बल्कि धैर्य के साथ प्रतिक्रिया देनी चाहिए,” और सीमा प्रबंधन को मजबूत करने तथा आर्थिक सहयोग को गहरा करने की आवश्यकता पर बल दिया।
भूटान के संदर्भ में उन्होंने कहा कि यह भारत की सबसे विश्वसनीय साझेदारियों में से एक है, लेकिन चीन के साथ चल रही सीमा वार्ताएँ रणनीतिक प्रभाव डाल सकती हैं।
उन्होंने कहा, “भूटान और चीन के बीच वर्ष 2021 में हस्ताक्षरित तीन-चरणीय रूपरेखा के अंतर्गत चल रही सीमा वार्ताओं ने वास्तविक रणनीतिक अनिश्चितता पैदा की है। भूटान-चीन की लगभग 470 किलोमीटर लंबी सीमा सिलिगुड़ी गलियारे के ऊपर स्थित है, जो भारत को उसके पूर्वोत्तर से जोड़ने वाला संकरा स्थल मार्ग है। इसलिए उस क्षेत्र में होने वाला कोई भी समझौता भारत के लिए अत्यंत रणनीतिक संवेदनशीलता का विषय है।” उन्होंने कहा कि भूटान का भारत पर विश्वास बढना चाहिए।
समुद्री पड़ोसियों के बारे में उन्होंने कहा कि प्रभाव बढ़ाने के साधन के रूप में आर्थिक सहयोग और संकट के समय सहायता महत्वपूर्ण माध्यम बनते जा रहे हैं।
श्रीलंका के आर्थिक संकट के दौरान भारत द्वारा दी गई सहायता का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा, “हिंद महासागर क्षेत्र में प्रभाव अब दबाव से नहीं बल्कि आर्थिक स्थिरता, संपर्क और संकट के समय त्वरित सहायता से बढ़ेगा।”
मालदीव के संदर्भ में उन्होंने कहा कि भारत को स्वयं को एक सहयोगी साझेदार के रूप में प्रस्तुत करना चाहिए, न कि एक प्रभुत्वशाली शक्ति के रूप में।
उन्होंने कहा, “प्रभाव ऐसा होना चाहिए जो सहयोग को सक्षम बनाए, न कि प्रभुत्व स्थापित करे,” और सुरक्षा सहयोग को संस्थागत बनाना चाहिए ताकि यह केवल कभी-कभी होने वाली प्रक्रिया न रहे बल्कि स्थायी बने।
म्यांमार की स्थिति पर उन्होंने चेतावनी दी कि वहां चल रहा लंबा आंतरिक संघर्ष भारत की सीमा स्थिरता को प्रभावित कर रहा है।
उन्होंने कहा, “अस्थिर सीमा की सुरक्षा पर खर्च किया गया हर रुपया सीमा क्षेत्र के विकास में निवेश होने से रह जाता है।” उन्होंने जोर देकर कहा कि पड़ोस को स्थिर करना भारत के अपने रणनीतिक हित में है।
उन्होंने कहा, “अपने पड़ोस को स्थिर बनाना उदारता का कार्य नहीं बल्कि राष्ट्रीय स्वार्थ का कार्य है।”
अफगानिस्तान के विषय में उन्होंने कहा कि भारत वहां से फिर सक्रिय हो सकने वाले उग्रवादी संगठनों को लेकर चिंतित है।
उन्होंने कहा, “अफगानिस्तान की स्थिति में किसी भी प्रकार की गिरावट या उग्रवादी गतिविधियों का पुनरुत्थान हमारे लिए सीधा सुरक्षा जोखिम है।”
पाकिस्तान के बारे में उन्होंने कहा कि वह अब भी भारत के विरुद्ध शत्रुतापूर्ण रणनीति अपनाए हुए है। उन्होंने कहा, “आतंकवाद और सैन्य दबाव पाकिस्तान की सरकार की नीति के साधन बने हुए हैं।”
ऑपरेशन सिंदूर के बाद की स्थिति का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि इस अभियान ने दोनों देशों के बीच प्रतिरोधक क्षमता की गतिशीलता को बदल दिया है।
उन्होंने कहा, “ऑपरेशन सिंदूर ने स्पष्ट रूप से दिखा दिया कि भारत परमाणु सीमा से नीचे रहते हुए प्रभावी पारंपरिक सैन्य कार्रवाई करने की क्षमता रखता है।”
उन्होंने पाकिस्तान के हाल के सैन्य पुनर्गठन का भी उल्लेख करते हुए चेतावनी दी कि इससे भविष्य में संकट की स्थिति तेजी से बढ़ सकती है।
उन्होंने कहा, “इसका अर्थ है कि संकट अधिक तेज़ी से विकसित हो सकते हैं। तनाव बढ़ने की सीढ़ियाँ छोटी हो सकती हैं। पारंपरिक युद्ध की संभावना बढ़ेगी। इस्लामाबाद में निर्णय-प्रक्रिया तेज़ हो सकती है लेकिन उसमें गलती की संभावना भी बढ़ सकती है।”
अंत में उन्होंने कहा कि क्षेत्र में स्थिरता बनाए रखने के लिए भारत को कूटनीति, आर्थिक सहयोग और विश्वसनीय सैन्य तैयारी—इन तीनों का संयोजन करना होगा।
उन्होंने कहा, “भारत के पड़ोस में स्थिरता अपने-आप नहीं आएगी। इसे निरंतर संवाद, विश्वसनीय प्रतिरोधक क्षमता, आर्थिक उदारता और आवश्यकता पड़ने पर कार्रवाई करने के साहस के माध्यम से प्राप्त करना होगा।”
