भोपाल: महाशिवरात्रि के पावन अवसर पर आयोजित किन्नर धर्म सम्मेलन इस बार सामाजिक समावेशन और धार्मिक विमर्शदोनों कारणों से चर्चा का केंद्र रहा। भव्य समारोह में देश-भर से आए किन्नर समुदाय के प्रतिनिधियों, संत-महात्माओं और श्रद्धालुओं की उपस्थिति ने इसे एक व्यापक सामाजिक-धार्मिक आयोजन का रूप दिया।सम्मेलन का मुख्य आकर्षण हिमांगी सखी का विधिवत पट्टाभिषेक रहा, जिन्हें देश की पहली किन्नर शंकराचार्य के रूप में घोषित किया गया। आयोजकों ने इसे किन्नर समाज की धार्मिक पहचान और नेतृत्व क्षमता के प्रतीक के रूप में प्रस्तुत किया। मंच से सनातन परंपराओं में किन्नर समुदाय की ऐतिहासिक भूमिका, आध्यात्मिक सहभागिता और सामाजिक स्वीकार्यता पर भी विस्तार से चर्चा हुई।
कार्यक्रम के दौरान कई अन्य धार्मिक पदों जैसे जगद्गुरु और महामंडलेश्वर की घोषणाएँ भी की गईं। साथ ही, कुछ किन्नरों की सनातन धर्म में घर वापसी कराए जाने की बात भी सामने आई, जिसे आयोजकों ने आस्था और सांस्कृतिक जुड़ाव की प्रक्रिया बताया।हालांकि समारोह ने जहां एक ओर समावेशी धार्मिक पहल का संदेश दिया, वहीं दूसरी ओर कुछ धार्मिक-सामाजिक समूहों ने इस नियुक्ति पर आपत्तियाँ भी दर्ज कराईं। उनका तर्क है कि पारंपरिक धार्मिक मान्यताओं के अनुसार शंकराचार्य की परंपरा सीमित और निर्धारित रही है, इसलिए नई घोषणाओं की मान्यता पर विमर्श आवश्यक है।
इस तरह यह सम्मेलन केवल एक धार्मिक आयोजन भर न रहकर सामाजिक बदलाव, परंपरा और आधुनिक दृष्टिकोण के बीच संवाद का मंच भी बन गया, जहां आस्था के साथ-साथ पहचान और स्वीकार्यता जैसे मुद्दे भी प्रमुखता से उभरे।
