यूरोप में कॉर्पोरेट की कोशिशें नाकाम, कर्मचारियों में बढ़ रही है मानसिक थकान

बिल्बाओ, 08 दिसंबर (वार्ता) यूरोप में काम के कारण हुई थकान (बर्नआउट) पूरे महाद्वीप में एक मानसिक स्वास्थ्य संकट को जन्म दे रही है। कार्यस्थल पर सुरक्षा एवं स्वास्थ्य के लिये यूरोपीय एजेंसी के एक सर्वेक्षण में यह खुलासा हुआ है।

इस सर्वेक्षण के अनुसार, यूरोप के 30 देशों में करीब 50 प्रतिशत कर्मचारियों का मानना है कि उनके ऊपर काम का भार ज़रूरत से ज़्यादा है, जबकि 34 प्रतिशत का मानना है कि उनकी मेहनत को अहमियत नहीं दी जाती। करीब 16 प्रतिशत ने काम के दौरान उत्पीड़न का दावा किया है।

इस दबाव की वजह से शोधकर्ताओं ने एक “प्रचलित विरोधाभास” की पहचान की है। कर्मचारियों के अच्छे मानसिक स्वास्थ्य पर किये गये अच्छे खासे निवेश के बावजूद स्थिति सुधर नहीं रही है।

यूरोपियन कंपनियों ने 2023 में ‘वर्कप्लेस वेलनेस’ पहल पर लगभग 16.9 अरब यूरो खर्च किये। कंपनियों ने माइंडफुलनेस क्लास और कोचिंग पर खर्चा किया, जो लगभग 29% कर्मचारियों के लिये उपलब्ध हैं।

यूरोपीय ट्रेड यूनियन इंस्टीट्यूट (ईटीयूआई) और अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन के विशेषज्ञों का कहना है कि ये कार्यक्रम इसलिये काम नहीं करते क्योंकि ये ‘संरचनात्मक मनोसामाजिक’ जोखिम का समाधान नहीं करते। यानि ये कार्यक्रम नौकरी से होने वाले तनाव, लंबी शिफ्ट, काम को पहचान न मिलना, नौकरी की असुरक्षा और मानसिक उत्पीड़न पर काम नहीं करते।

सकारात्मक मानसिकता विषय के शोधकर्ता जोलांता बर्क के अनुसार, मौजूदा तरीका अक्सर “बहुत ज़्यादा आसान, बहुत ज़्यादा मैकेनिकल होता है, और हमें नतीजे नहीं मिल रहे हैं।”

विशेषज्ञों का कहना है कि कर्मचारियों की बेहतरी के लिये कंपनियों को हर आयाम को ध्यान में रखते हुए एक दीर्घकालिक योजना बनाने की ज़रूरत है जो सिर्फ़ एड-हॉक एचआर कार्यक्रम से आगे बढ़कर काम करे। मानसिक रूप से स्वस्थ कार्यालय बनाने के लिये व्यवसाय की प्रक्रिया को फिर से सोचना होगा। इसमें भर्ती, पदोन्नति, काम की समीक्षा और प्रबंधन का तरीका शामिल है।

कुछ कंपनियां बड़े सुधारों के साथ प्रयोग कर रही हैं। मिसाल के तौर पर, ब्रिटेन, जर्मनी और आइसलैंड में हफ्ते में सिर्फ चार-दिन काम करवाने का प्रयोग किया गया। शुरुआती शोध से पता चलता है कि इससे मानसिक थकान कम हो सकती है। स्वीडन जैसे देशों में काम के भार और धमकाने को लेकर नियम हैं, जबकि फ्रांस और पुर्तगाल ने “राइट-टू-डिसकनेक्ट” कानून लागू किये हैं, जिसके तहत कोई कंपनी शिफ्ट खत्म होने के बाद काम के लिये कर्मचारी से संपर्क नहीं कर सकती।

 

 

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