पारम्परिक खेती: खेत में फिर हो रही बैलों की वापसी, निराई और बुवाई का हो रहा कार्य

सुसनेर. भारतीय कृषि में खेतों से गायब हो चुके बैलों की वापस अब खेतों में वापसी हो रही है. पर इस बार बैलों से जुताई के कार्य के बदले उनसे निराई और बुवाई का कार्य लिया जा रहा है. आधुनिक युग में भी आज भी कई किसान ऐसे हैं, जो पारम्पारिक और जैविक खेती पर जोर दे रहे हैं. साथ ही अन्य किसानों को भी इसके प्रति जागरूक कर रहे हैं.

भारतीय कृषि ने तकनीक के बदलाव के साथ ही कई दौर देखे हैं. क्योंकि एक वक्त था, जब खेती किसानी में बैल का सबसे अधिक इस्तेमाल होता था. फिर धीरे-धीरे ट्रैक्टर का इस्तेमाल बढ़ता गया और बैल के साथ बैलगाड़ी भी धीरे-धीरे प्रचलन से हटती गई. पर एक बार फिर से तकनीक के इजाद के साथ अब खेतों में बैल दिखाई देने लगे हैं. समीपस्थ ग्राम नांदना, कायरा, बढिया, माणा, मोड़ी, पायली, अंतरालिया, धारूखेड़ी, कजलास, पालड़ा, पटपड़ा, मानलनवासा सहित ग्रामों में हो रहा है. नांदना के किसान रामचन्द्र ने बोवनी बैलों के माध्मय से ही की है और इन्हीं के सहारे वे अपनी पूरी फसल को तैयार करेंगे.

ट्रेक्टर के इस्तेमाल के कारण घटी बैलों की संख्या

किसान बताते हैं कि 1961 में 90 फीसदी बैल थे. जिससे 71 फीसदी खेत का काम होता था. 1991 तक यह संख्या घटकर 23.3 प्रतिशत रह गई. बैलों का इस्तेमाल कम होने के कारण उनकी आबादी में गिरावट आई. दरअसल, मशीनीकरण के बाद, ट्रैक्टरों को सब्सिडी दी गई और सरकारों ने मशीनों को बढ़ावा दिया. इसके कारण ट्रैक्टर फर्म किसानों के दरवाजे तक पहुंच गई है. जबकि मशीनीकरण ने बड़े किसानों को लाभान्वित किया है. जो देश की किसान आबादी का 15 प्रतिशत हिस्सा हैं, लेकिन 75 प्रतिशत कृषि भूमि के मालिक हैं. यह छोटे और सीमांत किसानों के लिए अनुपलब्ध है, जिनके पास 2 हेक्टेयर से कम भूमि है.

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