बैतूल के छतरपुर गांव में है रावण का मंदिर, भगवान की तरह पूजते हैं आदिवासी

उमाकान्त शर्मा बैतूल आदिवासी समाज का एक वर्ग रावण दहन का विरोध करता है. इसकी वजह भी खास है. बैतूल के कुछ आदिवासी खुद को रावण का वंशज मानते हैं. यहां के छतरपुर गांव में रावण का एक मंदिर भी है जिसे रावनवाड़ी कहते हैं. रावनवाड़ी में हर साल मेला लगता है जिसमें हज़ारों आदिवासी अपने आराध्य रावण की पूजा अर्चना करते हैं.पहाड़ी पर रावनवाड़ी-बैतूल में घोड़ाडोंगरी ब्लॉक के छतरपुर गांव के पास लगभग 2 हज़ार फ़ीट ऊंची पहाड़ी है. इस पहाड़ी पर रावण का मंदिर है. रावण के प्रति यहा के आदिवासियों की अगाध श्रद्धा है. कुछ सालों से यहां दशहरे के बाद मेला लगता है जिसमे आदिवासी अपने आराध्य रावण की पूजा अर्चना करते हैं. और अपनी मन्नत मांगते हैं.रावण के इस मंदिर में रावण की प्रतिमा के साथ धातु से बने सैनिकों की भी प्रतिमाएं हैं जिसे रावण की सेना माना जाता है. इसके अलावा आदिवासी क्षेत्रों में रावण के पुत्र मेघनाद की भी पूजा होती है. जिसे स्थानीय आदिवासी अपना राजा मानते हैं. आदिवासियों के मुताबिक सदियों से रावण की पूजा करना उनके लिए एक खास परंपरा रही है.

रावण के पुतला दहन का विरोध: रावण के प्रति गहरी आस्था के कारण ही पिछले कई वर्षों से स्थानीय आदिवासी समुदाय से जुड़े संगठन के लोग दशहरे पर रावण दहन का विरोध करने लगे हैं. इनके मुताबिक वो जिस रावण के वंशज हैं उस रावण का दहन उनके इष्टदेव का दहन हैं ऐसा करना उनकी आस्था को ठेस पहुंचाता है यह बन्द होना चाहिये । हालांकि आदिवासी समुदाय के एक नेता का यह कहना हैं कि जो मंदिर छतरपुर में हैं वह राउनदेव का है उन्ही को पिछले पांच सात वर्षों से रावण देव कहने लगे हैं रावण पिछले कुछ वर्षों से ही आदिवासी समाज के आराध्य हुए हैं जिसके पीछे कई कारण हो सकते हैं।

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