400 पुरानी अनूठी परंपरा के साथ रीवा में मनाया जाता है दशहरा, गद्दी पूजन के बाद किला से निकलता है चल समारोह

रीवा, रीवा का दशहरा अपनी करीब 400 साल पुरानी राजसी और ऐतिहासिक परंपराओं के लिए पूरे विंध्य क्षेत्र में मशहूर है. रीवा रियासत के समय से चली आ रही इन अनूठी परंपराओं को देखने के लिए हर साल हजारों लोगों की भीड़ उमड़ती है.

इस वर्ष 20 अक्टूबर 2026 को रीवा में भव्य दशहरा उत्सव का आयोजन किया जा रहा है. रीवा के किला परिसर में दशहरा उत्सव की शुरुआत लगभग 350-400 साल पुरानी राजगद्दी पूजन परंपरा से होती है. इस दिन बघेल वंश के महाराजा (वर्तमान में पूर्व मंत्री पुष्पराज सिंह) भगवान राम को राजाधिराज मानकर विशेष पूजा-अर्चना करते हैं. शाही पोशाक और हाथों में तलवार लेकर की जाने वाली इस पूजा को देखने दूर-दूर से लोग आते हैं. वैसे तो सबसे खास दशहरा का पर्व मैसूर का माना जाता है, लेकिन रीवा में दशहरा पर्व शाही अंदाज में मनाया जाता है. यहां रीवा रियासत के महाराजा द्वारा सिंहासन की गद्दी पर विराजमान भगवान राम की विशेष पूजा की जाती है. इसके बाद महाराजा महल से बाहर आकर प्रजा को दर्शन देते हैं. महाराज के द्वारा नीलकंठ पक्षी को आकाश की ओर उड़ाया जाता है. इसके बाद प्रजा से भेंटकर महाराजा पान का स्वाद चखते हैं. बाद में किला परिसर से भव्य चल समारोह का अयोजन किया जाता है. किला परिसर से पूजा के बाद रीवा रियासत का एक पारंपरिक शाही चल समारोह (जुलूस) निकाला जाता है, जिसमें नगरवासी महाराजा का अभिवादन करते हैं. इसके अलावा, विंध्य क्षेत्र और देश का नाम रोशन करने वाली प्रमुख हस्तियों को राजघराने द्वारा सम्मानित भी किया जाता है. रीवा का दशहरा बेहद मसहूर है और समूचे विंध्य से लोग पहले देखने आते थे.

मैसूर की तर्ज चल समारोह

रीवा राजघराने के ऐतिहासिक किले से दशहरा पर चल समरोह निकाला जाता है, जिसमें राजधिराज भगवान राम रथ पर सवार होकर शहर में निकलते हैं. इस दौरान रियासत के महाराजा उनके सेवक बनकर साथ-साथ चलते हैं. पीछे मां दुर्गा की सुंदर झाकियां निकाली जाती है. रीवा रियासत का यह रिवाज 400 साल से भी ज्यादा पुराना है. तब से लेकर अब तक यह परंपरा प्रत्येक वर्ष निभाई जा रही है.

400 सालों से गद्दी विराजमान है राजाधिराज राम

इतिहासकार असद खान के मुताबिक, ‘बघेल राजवंश की स्थापना के बाद से अब तक 37 पीढिय़ों तक के राजाओं ने राजपाठ संभला हैं. तब से लेकर अब तक एक भी राजा ने राज सिंहासन में बैठकर राज्य नहीं किया है. क्योंकि बघेल राजवंश की राजगद्दी पर भगवान राम, मां सीता और लक्ष्मण जी को राजाधिराज के रूप में विराजमान हैं. राजवंश के सभी राजा खुद को भगवान के सेवक मान कर प्रजा की सेवा करते आए हैं. यह परंपरा बीते 400 सालों से चली आई है. वहीं, दशहरे के दिन राजसी अंदाज में भगवान की पूजा अर्चना का प्रचलन शुरू हुआ. रियासत के प्रत्येक महाराजा इस परंपरा को उसी शाही अंदाज में निभाते चले आए हैं.

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