भोपाल। आचार्य श्री 108 समयसागर जी महाराज ने कहा कि पुण्य का वास्तविक आध्यात्मिक मूल्य सांसारिक लाभ की इच्छा में नहीं, बल्कि व्यक्ति के भावों की शुद्धता में निहित है। धार्मिक क्रियाओं का उद्देश्य आत्मकल्याण होना चाहिए, न कि भौतिक सुखों की प्राप्ति।
जैन धर्मग्रंथ समयसार के स्वाध्याय के दौरान आचार्यश्री ने पुण्यानुबंधी पुण्य और पापानुबंधी पुण्य के स्वरूप को स्पष्ट किया। उन्होंने बताया कि संयम, कषायों की मंदता और निर्मल भावों के साथ की गई धार्मिक साधना आत्मकल्याण का मार्ग प्रशस्त करती है। इसके विपरीत, यदि व्रत, नियम और धार्मिक अनुष्ठान तीव्र सांसारिक इच्छाओं अथवा इंद्रिय सुखों की आकांक्षा से किए जाते हैं, तो उनका आध्यात्मिक उद्देश्य प्रभावित हो सकता है।
आचार्यश्री ने सम्यक दर्शन के महत्व पर प्रकाश डालते हुए जैन दर्शन की पांचवीं आध्यात्मिक अवस्था का उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि किसी व्यक्ति की आध्यात्मिक प्रगति का आकलन केवल उसके बाहरी आचरण से नहीं किया जाना चाहिए, बल्कि उसके आंतरिक भावों को भी समझना आवश्यक है।
उन्होंने श्रद्धालुओं से आत्मनिरीक्षण करने, अपनी कमियों को पहचानने और कषायों को कम करने का आह्वान किया। उन्होंने स्पष्ट किया कि सच्चा धार्मिक आचरण वही है, जिसमें प्रत्येक कार्य के पीछे भावों की निर्मलता और आत्मकल्याण की भावना हो।
इस प्रवचन की जानकारी मीडिया प्रभारी भविष्य जैन ने दी।
