जबलपुर: केन-बेतवा लिंक परियोजना के पर्यावरणीय और सामाजिक प्रभावों को लेकर दायर जनहित याचिका की सुनवाई करते हुए मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने केंद्र सरकार से सेंट्रल एम्पावर्ड कमेटी (सीईसी) की रिपोर्ट प्रस्तुत करने के निर्देश जारी किये थे। हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस अल्पेश वाई कोगजे तथा जस्टिस विशाल जैन की युगलपीठ से केन्द्र व राज्य सरकार ने रिपोर्ट पेश करने के लिए समय प्रदान करने का आग्रह किया।
युगलपीठ ने आग्रह को स्वीकार करते हुए दो सप्ताह का समय प्रदान किया है।जबलपुर के अधिवक्ता अरिहंत तिवारी की ओर से दायर याचिका में आरोप लगाया गया है कि परियोजना से पन्ना टाइगर रिजर्व के वन क्षेत्र, बाघों सहित अन्य वन्यजीवों के प्राकृतिक आवास और उनके विचरण गलियारों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है। केन घडियाल अभयारण्य पर संभावित असर का मुद्दा उठाते हुए स्वतंत्र और वैज्ञानिक आंकलन की जरूरत भी बताई गई है। याचिका में वर्ष 2017 की पर्यावरण प्रभाव आंकलन रिपोर्ट की विश्वसनीयता पर सवाल उठाते हुए तथ्यात्मक त्रुटियों और स्वतंत्र जल वैज्ञानिक अध्ययन की जरूरत का उल्लेख किया गया है। वन कटाई से बुंदेलखंड के पर्यावरण और स्थानीय जलवायु पर पडने वाले संभावित प्रभावों की ओर भी ध्यान दिलाया गया है।
इसके साथ ही याचिका में छतरपुर जिले में परियोजना के विरोध में आदिवासियों और किसानों के आंदोलन व प्रदर्शनकारियों पर प्रशासनिक दबाव डालने के आरोप लगाए गए हैं। राशन-पानी की आपूर्ति और ग्रामीणों की आवाजाही प्रभावित किए जाने संबंधी दावे भी किए गए हैं। इन आरोपों पर अदालत का अंतिम निष्कर्ष सामने आना बाकी है। केन-बेतवा परियोजना का उद्देश्य केन नदी के जल को बेतवा नदी बेसिन तक पहुंचाकर बुंदेलखंड के सूखा प्रभावित क्षेत्रों में सिंचाई और पेयजल सुविधा बढ़ाना है। याचिका में परियोजना के लाभों के साथ उसके पर्यावरणीय और सामाजिक प्रभावों के व्यापक मूल्यांकन की मांग की गई है। सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता अरिहंत तिवारी ने स्वयं पक्ष रखा।
